मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसकी कहानी अपने आप में बेहद अनोखी है। यहां भगवान शनि का मंदिर साल के कई महीनों तक तालाब के पानी से घिरा रहता है। खास बात यह है कि मंदिर किसी पहाड़ी या नदी किनारे नहीं, बल्कि मऊसहानिया गांव के जगत सागर तालाब के बीचों-बीच स्थित है। बारिश के मौसम में जब तालाब का जलस्तर बढ़ता है, तो मंदिर का परिसर पानी में डूब जाता है। स्थानीय मान्यता है कि तालाब का पानी भगवान शनि के चरणों को स्पर्श करने के बाद ही धीरे-धीरे कम होता है।
जगत सागर तालाब के बीच बना है मंदिर
छतरपुर जिले से करीब 17 किलोमीटर दूर स्थित मऊसहानिया गांव में जगत सागर तालाब के बीच यह प्राचीन शनि मंदिर बना हुआ है। बारिश के दिनों में तालाब का जलस्तर बढ़ने के साथ मंदिर तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले यहां पक्की सड़क की सुविधा नहीं थी, इसलिए कई बार मंदिर लंबे समय तक श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता था।
अब तालाब के बीच तक पक्की सड़क बनी हुई है, जिससे श्रद्धालु मंदिर परिसर के आसपास तक पहुंच सकते हैं। हालांकि, अधिक जलभराव होने पर मुख्य मंदिर में प्रवेश रोक दिया जाता है। मंदिर के पुजारी और सेवक पानी के बीच जाकर सुबह-शाम पूजा-अर्चना करते हैं।
करीब 500 साल पुराना बताया जाता है मंदिर
मंदिर के पुजारी के अनुसार, यह धार्मिक स्थल करीब 500 वर्ष पुराना है। स्थानीय परंपरा में मंदिर और तालाब का निर्माण महाराज छत्रसाल के पुत्र जगत सिंह से जोड़ा जाता है। इसी वजह से तालाब को जगत सागर के नाम से जाना जाता है।
सदियों से यह स्थान भगवान शनि की उपासना का केंद्र रहा है। तालाब के बीच स्थित होने के कारण बारिश के मौसम में इसका स्वरूप और भी अलग दिखाई देता है। चारों ओर पानी और उसके बीच स्थित मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है।
अष्टधातु की शनि प्रतिमा और नवग्रह
इस मंदिर की एक खास विशेषता यहां स्थापित भगवान शनि की अष्टधातु की प्रतिमा है। मंदिर में शनि देव के साथ नौ ग्रहों की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। इसी कारण इसे स्थानीय रूप से शनि नवग्रह मंदिर भी कहा जाता है।
मंदिर में शनि देव की शिला स्वरूप में रुद्र अवतार की स्थापना भी बताई जाती है, जिसकी स्थापना वर्ष 2008 में हुई थी। श्रद्धालु यहां शनि देव की पूजा-अर्चना कर ग्रह संबंधी बाधाओं से मुक्ति और जीवन में सुख-शांति की कामना करते हैं।
शनि देव के चरणों को स्पर्श करता है पानी
इस मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता तालाब के पानी को लेकर है। स्थानीय लोगों और मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि हर वर्ष बारिश के दौरान तालाब का पानी बढ़ते-बढ़ते भगवान शनि के चरणों तक पहुंचता है। मान्यता है कि जब जल शनि देव के चरणों को स्पर्श कर लेता है, उसके बाद ही पानी का स्तर कम होना शुरू होता है।
हालांकि मंदिर परिसर में जमा पानी को निकालने के लिए मोटरों का भी इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन स्थानीय श्रद्धालु जलस्तर के इस बदलाव को शनि देव से जुड़ी पुरानी मान्यता के रूप में देखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में अधिक बारिश के कारण मंदिर लंबे समय तक जलमग्न रहने की बात भी सामने आई है। एक वर्ष यहां करीब आठ महीने तक मंदिर बंद रहने की जानकारी मंदिर से जुड़े लोगों ने दी।
बारिश के दिनों में श्रद्धालुओं की सुरक्षा का विशेष ध्यान
जलभराव के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं का प्रवेश रोक दिया जाता है, क्योंकि परिसर में पानी की गहराई बढ़ जाती है। सुरक्षा के लिए रैलिंग लगाने और लोगों को गहरे पानी में जाने से रोकने की व्यवस्था भी की जाती है।
बारिश कम होने और जलस्तर घटने के बाद श्रद्धालु फिर से मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचने लगते हैं। इस तरह मऊसहानिया का यह प्राचीन शनि मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति और वर्षों पुरानी स्थानीय मान्यताओं के कारण भी लोगों के बीच विशेष पहचान रखता है। तालाब के बीच स्थित यह मंदिर आज भी शनि भक्ति और लोक आस्था की एक अनोखी तस्वीर प्रस्तुत करता है।