“दिव्यसुधा – भक्ति की अमृत धारा” के सितंबर माह में आपका हार्दिक स्वागत है। सनातन परंपरा केवल पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन को समझने, कर्म को पहचानने, संस्कारों को आत्मसात करने और आत्मचिंतन के माध्यम से स्वयं को जानने की एक सतत यात्रा है। हमारी पौराणिक कथाओं, पर्वों और शास्त्रीय परंपराओं में ऐसे अनेक जीवन-संदेश छिपे हैं, जो आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। इसी भावना के साथ यह अंक आपके लिए आस्था, ज्ञान, जिज्ञासा और आध्यात्मिक चिंतन का एक सुंदर संगम लेकर आया है।
इस अंक की विशेष प्रस्तुति जन्माष्टमी विशेष है। भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कथाओं के साथ उनके जीवन-दर्शन को समझने का प्रयास किया गया है। श्रीकृष्ण ने बिना युद्ध के समस्याओं का समाधान कैसे किया, भक्त के प्रेम में भगवान कैसे बंध जाते हैं और सेवा में बसे कान्हा का भाव क्या है, ऐसे प्रसंग हमें भक्ति के साथ विवेक, प्रेम और कर्म का महत्व भी समझाते हैं। वहीं एकलव्य और द्रोणाचार्य की कथा गुरु-भक्ति, कर्तव्य और निर्णयों की जटिलताओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
वराह जयंती, भगवान विष्णु के दशावतार और भारत के प्राचीन विष्णु मंदिरों के माध्यम से हम अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को करीब से जानेंगे। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की महिमा, महर्षि दधीचि के महान त्याग और ऋषिपंचमी की परंपरा, तप, त्याग, कर्म और प्रायश्चित के महत्व को सामने लाती है। वहीं अनंत चतुर्दशी की कथा विश्वास और समर्पण की शक्ति का संदेश देती है।
इस अंक में गर्भाधान संस्कार, जन्म-मृत्यु के बाद सूतक-पातक की परंपरा, नाखूनों में छिपे ग्रहों के संकेत और हिन्दू शास्त्रों के अनसुलझे रहस्य जैसे विषय हमारी परंपराओं के उन पहलुओं से परिचित कराएंगे, जिनके प्रति जिज्ञासा आज भी बनी हुई है। महाभारत में शिव और शक्ति की दिव्य लीला, मारीच का स्वर्ण मृग वाला छल और श्रीराम द्वारा हनुमान को मृत्युदंड दिए जाने की कथा भी पाठकों को रोचक आध्यात्मिक विमर्श से जोड़ेगी।
हमें विश्वास है कि ‘दिव्यसुधा’ का सितंबर माह में आपको भक्ति, ज्ञान, आत्मचिंतन और सनातन संस्कृति से गहराई से जोड़ने में सहायक बनेगा। आपकी प्रतिक्रियाएं और सुझाव हमारे लिए अमूल्य हैं। अपने मौलिक लेख, विचार या शोध हमारे साथ साझा करें। रचनाएं प्रकाशित करवाने के लिए ई-मेल करें – omdivyasudha@gmail.com
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