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दिव्य सुधा > आरती/मंत्र > श्री सरस्वती चालीसा: संपूर्ण पाठ, महत्व और लाभ
आरती/मंत्र

श्री सरस्वती चालीसा: संपूर्ण पाठ, महत्व और लाभ

दिव्यसुधा
Last updated: August 21, 2026 5:46 pm
दिव्यसुधा
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मां सरस्वती की वीणा धारण किए हुए दिव्य स्वरूप की छवि
श्री सरस्वती चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें और मां सरस्वती से ज्ञान, बुद्धि एवं विद्या की प्राप्ति की कामना करें।
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शास्त्रों में मां सरस्वती को ज्ञान, बुद्धि, विद्या और वाणी की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। मां सरस्वती की कृपा से व्यक्ति को ज्ञान, विवेक और विद्या की प्राप्ति होती है। विद्यार्थी और ज्ञान की साधना करने वाले भक्त विशेष रूप से मां सरस्वती की आराधना करते हैं।

Contents
श्री सरस्वती चालीसाश्री सरस्वती चालीसा का महत्व

मान्यता है कि श्रद्धा और भक्तिभाव से श्री सरस्वती चालीसा का नियमित पाठ करने से मां सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। इससे बुद्धि और ज्ञान की वृद्धि के साथ जीवन में सफलता, मान-सम्मान और सकारात्मकता प्राप्त होने की कामना की जाती है।

श्री सरस्वती चालीसा

॥ दोहा ॥

जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु॥

॥ चौपाई ॥

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।
जय सर्वज्ञ अमर अविनासी॥

जय जय जय वीणाकर धारी।
करती सदा सुहंस सवारी॥

रूप चतुर्भुजधारी माता।
सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

जग में पाप बुद्धि जब होती।
जबहि धर्म की फीकी ज्योती॥

तबहि मातु ले निज अवतारा।
पाप हीन करती महि तारा॥

बाल्मीकि जी थे ब्रह्म ज्ञानी।
तव प्रसाद जानै संसारा॥

रामायण जो रचे बनाई।
आदि कवी की पदवी पाई॥

कालिदास जो भये विख्याता।
तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

तुलसी सूर आदि विद्धाना।
भये और जो ज्ञानी नाना॥

तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा।
केवल कृपा आपकी अम्बा॥

करहु कृपा सोइ मातु भवानी।
दुखित दीन निज दासहि जानी॥

पुत्र करै अपराध बहूता।
तेहि न धरइ चित सुन्दर माता॥

राखु लाज जननी अब मेरी।
विनय करूं बहु भाँति घनेरी॥

मैं अनाथ तेरी अवलंबा।
कृपा करउ जय जय जगदंबा॥

मधु कैटभ जो अति बलवाना।
बाहुयुद्ध विष्णू ते ठाना॥

समर हजार पांच में घोरा।
फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥

मातु सहाय भई तेहि काला।
बुद्धि विपरीत करी खलहाला॥

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।
पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

चंड मुण्ड जो थे विख्याता।
छण महुं संहारेउ तेहि माता॥

रक्तबीज से समरथ पापी।
सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी॥

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा।
बार बार बिनवउं जगदंबा॥

जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा।
छिन में बधे ताहि तू अम्बा॥

भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई।
रामचन्द्र बनवास कराई॥

एहि विधि रावन वध तुम कीन्हा।
सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा॥

को समरथ तव यश गुन गाना।
निगम अनादि अनंत बखाना॥

विष्णु रूद्र अज सकहिं न मारी।
जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥

रक्त दन्तिका और शताक्षी।
नाम अपार है दानव भक्षी॥

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥

दुर्ग आदि हरनी तू माता।
कृपा करहु जब जब सुखदाता॥

नृप कोपित जो मारन चाहै।
कानन में घेरे मृग नाहै॥

सागर मध्य पोत के भंगे।
अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥

भूत प्रेत बाधा या दुःख में।
हो दरिद्र अथवा संकट में॥

नाम जपे मंगल सब होई।
संशय इसमें करइ न कोई॥

पुत्रहीन जो आतुर भाई।
सबै छांड़ि पूजें एहि माई॥

करै पाठ नित यह चालीसा।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा॥

धूपादिक नैवेद्य चढावै।
संकट रहित अवश्य हो जावै॥

भक्ति मातु की करै हमेशा।
निकट न आवै ताहि कलेशा॥

बंदी पाठ करें शत बारा।
बंदी पाश दूर हो सारा॥

करहु कृपा भवमुक्ति भवानी।
मो कहं दास सदा निज जानी॥

॥ दोहा ॥

माता सूरज कान्ति तव, अंधकार मम रूप।
डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप॥

बल बुद्धि विद्या देहुं मोहि, सुनहु सरस्वति मातु।
अधम रामसागरहिं तुम, आश्रय देउ पुनातु॥

श्री सरस्वती चालीसा का महत्व

मां सरस्वती को ज्ञान और विद्या की देवी माना जाता है। भक्त श्रद्धापूर्वक मां सरस्वती की पूजा और चालीसा का पाठ करके ज्ञान, बुद्धि, वाणी और विवेक की प्राप्ति की कामना करते हैं। विद्यार्थियों के लिए भी मां सरस्वती की आराधना विशेष महत्व रखती है।

नियमित रूप से चालीसा का पाठ करते समय मन को शांत रखकर मां सरस्वती का ध्यान करना और श्रद्धा के साथ पाठ करना शुभ माना जाता है।

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