हिंदू धर्म में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व माना गया है। इस पावन तिथि को वट पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना गया है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया यह व्रत दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और खुशहाली बनाए रखता है। महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और पश्चिम भारत के कई राज्यों में यह पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
वट पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
वट पूर्णिमा के दिन वट अर्थात बरगद के वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है। शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष में ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव तीनों का दिव्य निवास माना गया है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर उसकी परिक्रमा करती हैं और कच्चा धागा लपेटते हुए अपने पति की लंबी आयु तथा परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से वैवाहिक जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-शांति का वास होता है।
वट पूर्णिमा व्रत कथा
वट पूर्णिमा का महत्व सावित्री और सत्यवान की अमर कथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, सावित्री राजा अश्वपति की पुत्री थीं, जबकि सत्यवान वन में रहने वाले राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। विवाह से पूर्व महर्षि नारद ने सावित्री के पिता को बताया था कि सत्यवान अत्यंत गुणवान और धर्मात्मा हैं, लेकिन उनकी आयु बहुत कम है। इसके बावजूद सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और सत्यवान से विवाह किया।
विवाह के बाद सावित्री को जब अपने पति की अल्पायु का स्मरण हुआ, तो उन्होंने कठोर व्रत और तपस्या आरंभ कर दी। नियत समय आने पर सत्यवान लकड़ियां काटने के लिए वन गए और सावित्री भी उनके साथ चली गईं। अचानक सत्यवान अचेत होकर सावित्री की गोद में लेट गए और उसी समय यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे।
सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म और अटूट निष्ठा के बल पर यमराज का पीछा किया। उनकी भक्ति, धैर्य और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कई वरदान दिए। अंत में सावित्री ने अपने पति के जीवन का वर मांग लिया। वचनबद्ध होने के कारण यमराज को सत्यवान के प्राण वापस लौटाने पड़े। जब सावित्री बरगद के वृक्ष के नीचे लौटीं तो सत्यवान पुनः जीवित हो चुके थे। तभी से वट पूर्णिमा का व्रत अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
व्रत कथा सुनना क्यों है आवश्यक?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, वट पूर्णिमा के दिन केवल व्रत रखना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण या पाठ भी अत्यंत आवश्यक होता है। कहा जाता है कि बिना व्रत कथा सुने यह व्रत अधूरा माना जाता है। कथा का श्रवण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है तथा भगवान की कृपा से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख, समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों महिलाएं श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पावन व्रत का पालन करती हैं।