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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > बटुक भैरव जयंती 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व
व्रत और त्योहार

बटुक भैरव जयंती 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

दिव्यसुधा
Last updated: June 28, 2026 5:50 pm
दिव्यसुधा
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भगवान बटुक भैरव के बाल स्वरूप की प्रतिमा, दीपक, लाल पुष्प और पूजा सामग्री के साथ बटुक भैरव जयंती 2026 की पूजा का दृश्य।
बटुक भैरव जयंती पर श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भय, बाधाएं और राहु-केतु से जुड़े दोष शांत होने की मान्यता है।
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बटुक भैरव जयंती भगवान शिव के बाल एवं सौम्य स्वरूप की उपासना का अत्यंत पावन पर्व माना जाता है। वर्ष 2026 में बटुक भैरव जयंती 29 जून, सोमवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने संसार को संकटों और दुष्ट शक्तियों से बचाने के लिए पांच वर्षीय बालक के रूप में अवतार लिया था। बटुक भैरव को संकटों का नाश करने वाला, भय दूर करने वाला और भक्तों की रक्षा करने वाला देव माना जाता है। इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, राहु-केतु से जुड़े दोष शांत होते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसलिए यह दिन शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।

बटुक भैरव जयंती 2026 का शुभ मुहूर्त
पूजा और साधना के लिए इस दिन कई शुभ मुहूर्त बन रहे हैं, जिनमें भगवान बटुक भैरव की आराधना करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:04 बजे से 04:44 बजे तक – मंत्र जप, ध्यान और आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वोत्तम।
लाभ-उन्नति मुहूर्त: सुबह 05:25 बजे से 07:09 बजे तक – सफलता और उन्नति की कामना के लिए शुभ।
अमृत मुहूर्त: सुबह 07:09 बजे से 08:54 बजे तक – सभी प्रकार की पूजा और शुभ कार्यों के लिए उत्तम।
शुभ मुहूर्त: सुबह 10:39 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक – भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करने का समय।
निशिता मुहूर्त: रात्रि 12:04 बजे से 12:44 बजे तक – भैरव साधना, तांत्रिक उपासना और विशेष मंत्र जाप के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

बटुक भैरव जयंती का धार्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, ‘आपद’ नामक अत्याचारी असुर के आतंक से देवता और ऋषि-मुनि अत्यंत व्याकुल हो गए थे। तब भगवान शिव ने बालक का दिव्य स्वरूप धारण कर उस असुर का संहार किया और देवताओं को भय से मुक्त कराया। इसी दिव्य अवतार को बटुक भैरव कहा जाता है।

बटुक भैरव, भगवान शिव का सौम्य और करुणामय स्वरूप माने जाते हैं। यही कारण है कि गृहस्थ जीवन जीने वाले भक्त भी सरलता से उनकी पूजा कर सकते हैं। मान्यता है कि उनकी आराधना करने से शत्रु बाधा, भय, नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव, मानसिक तनाव तथा ग्रह दोष दूर होते हैं। विशेष रूप से राहु-केतु से जुड़े कष्टों को शांत करने के लिए बटुक भैरव की पूजा अत्यंत प्रभावी मानी गई है। श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई उपासना जीवन में आत्मबल, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

बटुक भैरव जयंती की पूजा विधि
इस पावन दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत और पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थान को शुद्ध करके लाल रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान बटुक भैरव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को लाल पुष्प, अक्षत, काले तिल तथा सरसों के तेल का दीपक अर्पित करें। इसके बाद खीर, पूरी, मीठी रोटी, हलवा और उबले हुए काले चनों का भोग लगाएं। श्रद्धापूर्वक “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ॥” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। अंत में भगवान बटुक भैरव की आरती कर परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें।

बटुक भैरव की कृपा से दूर होते हैं जीवन के संकट
मान्यता है कि जो भक्त बटुक भैरव जयंती के दिन पूरे श्रद्धा भाव से भगवान की पूजा करता है, उसके जीवन से भय, बाधाएं और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त होने लगता है। भगवान बटुक भैरव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और जीवन में सुख, शांति, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसलिए इस पावन अवसर पर भगवान शिव के बाल स्वरूप की आराधना कर उनका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें।

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