प्राचीन काल में सुमेरु पर्वत के समीप ऋषियों के आश्रमों में तप और वैराग्य की ध्वनि गूँजती थी। वहीं वानरराज केसरी और माता अंजना के यहाँ एक दिव्य तेज से युक्त बालक का जन्म हुआ। यह कोई साधारण शिशु नहीं था—वे थे पवनदेव के अंशावतार, भविष्य के महावीर। जन्म से ही उनमें असाधारण बल, वेग और जिज्ञासा विद्यमान थी। उनकी चंचलता में भी एक दिव्य आभा झलकती थी।
एक दिन प्रातःकाल की अरुणिमा फैली हुई थी। आकाश में लालिमा बिखरी थी और पूर्व दिशा में सूर्यदेव उदित हो रहे थे। बालक ने उस लाल, गोल, चमकते हुए सूर्य को पका हुआ फल समझ लिया। उनके मन में बालसुलभ विचार आया—“यह तो अद्भुत फल है, इसे अवश्य प्राप्त करना चाहिए।” इतना सोचते ही वे आकाश की ओर उछल पड़े। उनकी छलाँग साधारण नहीं थी; वे पर्वतों को लाँघते, बादलों को चीरते हुए सीधे सूर्य की ओर बढ़ चले।
उनकी गति देखकर देवताओं में चिंता व्याप्त हो गई। यदि यह बालक सूर्य को ग्रस लेगा तो सृष्टि अंधकार में डूब जाएगी। देवराज इंद्र ने इसे सृष्टि-संतुलन के लिए संकट माना। उन्होंने अपने दिव्य आयुध वज्र से उस बालक पर प्रहार कर दिया। वज्र सीधा उनकी ठोड़ी—‘हनु’—पर आ लगा। प्रहार इतना तीव्र था कि बालक मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े और उनकी ठोड़ी कुछ विकृत हो गई।
प्राणवायु के अभाव में देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी सभी तड़पने लगे

यह दृश्य देखकर पवनदेव का हृदय क्रोध और शोक से भर उठा। वे अपने प्रिय पुत्र की पीड़ा सह न सके। उन्होंने तत्काल संपूर्ण जगत से वायु का संचार रोक दिया। प्राणवायु के अभाव में देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी सभी तड़पने लगे। सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवता ब्रह्मा के नेतृत्व में वहाँ पहुँचे और पवनदेव को शांत करने का प्रयास किया।
यमराज ने अकाल मृत्यु से रक्षा का वचन दिया
ब्रह्मा ने बालक को स्पर्श कर उन्हें पुनर्जीवित किया। तत्पश्चात प्रत्येक देवता ने उन्हें अनुपम वरदान प्रदान किए। इंद्र ने वज्र के प्रभाव को निष्प्रभावी करते हुए उन्हें अभय दिया कि भविष्य में उनका वज्र उन्हें क्षति नहीं पहुँचाएगा। अग्निदेव ने अग्नि से अप्रभावित रहने का वर दिया, वरुण ने जल से निर्भयता का आशीर्वाद दिया, यमराज ने अकाल मृत्यु से रक्षा का वचन दिया। सूर्यदेव ने उन्हें ज्ञान और तेज का वरदान दिया। इस प्रकार वे असीम बल, अतुल बुद्धि और अमर कीर्ति से विभूषित हुए।
इसी घटना के कारण उनका नाम पड़ा—“हनुमान”। संस्कृत में ‘हनु’ का अर्थ है ठोड़ी। जिनकी हनु विशेष हो, या जिनकी हनु पर आघात हुआ हो, वे ‘हनुमान’ कहलाए। यह नाम केवल शारीरिक घटना का संकेत नहीं, बल्कि उनके अद्वितीय धैर्य और दिव्य सहनशक्ति का प्रतीक बन गया।
आगे चलकर यही बालक रामचरितमानस में वर्णित भगवान हनुमान के रूप में प्रकट होते हैं—“अतुलित बलधामं, हेमशैलाभदेहं।” वे श्रीराम के परम भक्त, नीति और निष्ठा के आदर्श तथा सेवा-भाव के सर्वोच्च प्रतीक बने। लंका-दहन से लेकर संजीवनी लाने तक, उनकी प्रत्येक लीला में वही बालसुलभ निडरता और देवप्रदत्त शक्ति झलकती है।
इस प्रकार हनुमान नामकरण की कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि दिव्य शक्तियाँ भी परीक्षा और संघर्ष से गुजरकर ही पूर्ण महिमा को प्राप्त करती हैं। बाललीला, वज्रप्रहार और देववरदान से जुड़ी यह कथा आज भी श्रद्धा, साहस और भक्ति की प्रेरणा देती है।