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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > भारत का एकमात्र मंदिर जहां शनिदेव के साथ होती है बहन यमुना की पूजा
मंदिर

भारत का एकमात्र मंदिर जहां शनिदेव के साथ होती है बहन यमुना की पूजा

दिव्यसुधा
Last updated: April 26, 2025 10:50 am
दिव्यसुधा
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उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में खरसाली गांव है, जहां एक प्राचीन शनि मंदिर है। इस मंदिर में शनिदेव के साथ यमुना की भी पूजा होती है। खरसाली गांव से लगभग 5 किलोमीटर दूर यमुनोत्री है, जहां यमुना नदी का उद्गम स्थल है। सर्दियों के मौसम में यहां भारी बर्फबारी के कारण यमुनोत्री मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसलिए सर्दियों के समय मां यमुना की मूर्ति खरसाली गांव के शनि मंदिर में लाई जाती है और करीब 6 महीने तक शनिदेव के साथ उनकी पूजा होती है। हर साल बैसाखी के पर्व पर यमुनोत्री मंदिर के कपाट फिर से श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं।

लकड़ियों और पत्थरों से बना है मंदिर

ज्योतिष के अनुसार, लकड़ी का संबंध शनि ग्रह से है। वही खास बात यह है कि 7000 फीट की ऊंचाई पर बने इस मंदिर को बनाने में लकड़ी का ज्यादा प्रयोग हुआ है। यह मंदिर पांच मंजिला मकान जैसा दिखता है। पत्थर और लकड़ी से मिलकर बना यह मंदिर बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं से सुरक्षित रहता है। लकड़ी एवं पत्थर से बना यह पांच मंजिला मंदिर क्षेत्र की अनूठी वास्तुकला का नमूना भी है। स्कंद पुराण में बताया गया है कि मंदिर परिसर में मौजूद बेखिर के पेड़ के नीचे शनिदेव प्रकट हुए थे।

शनिदेव भी जाते हैं बहन यमुना से मिलने

कहा जाता है कि हर साल अक्षय तृतीया के दिन शनि देव अपनी बहन यमुना से यमुनोत्री धाम में मुलाकात कर खरसाली लौट आते हैं। भाई दूज या यम द्वितीया के दिन, जो दिवाली के दो दिन बाद आता है, यमुना को फिर से खरसाली लाया जा सकता है। इस अवसर पर शनि देव और देवी यमुना की पूजा करके एक धार्मिक यात्रा निकाली जाती है। शनि देव साल भर मंदिर में विराजमान रहते हैं। इसके अलावा, सावन की संक्रांति के समय खरसाली में तीन दिन का विशेष शनि देव मेला भी आयोजित होता है।

मंदिर से जुड़े चमत्कार

वर्ष में एक बार कार्तिक पूर्णिमा के दिन इस मंदिर में एक चमत्कार देखने को मिलता है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, इस दिन शनि मंदिर के ऊपर रखे घड़े अपने आप बदल जाते हैं। यह घटना साल में सिर्फ एक बार होती है। एक और कथा है कि मंदिर में दो बड़े फूलदान रखे गए हैं, जिन्हें रिखोला और पिखोला कहा जाता है। इस फूलदान को ज़ंजीर से बांधकर रखा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि पूर्णिमा की रात ये फूलदान नदी की ओर बढ़ने लगते हैं और अगर इन्हें न बांधा जाए तो ये गायब हो सकते हैं।

पांडवों ने बनवाया था मंदिर

यह शनि मंदिर बहुत प्राचीन है और माना जाता है कि इसे महाभारत काल में पांडवों ने बनवाया था। मंदिर की पांचवीं मंजिल पर शनिदेव की कांसे की मूर्ति स्थापित है। साथ ही नाग देवता और देवी यमुना की मूर्तियां भी यहां विराजमान हैं। इस मंदिर में एक अखंड ज्योति भी जलती रहती है। कहा जाता है कि शनिवार के दिन इस अखंड ज्योति के दर्शन मात्र से मनुष्य के जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं।

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