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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > करवाचौथ व्रत :- स्त्री का संकल्प और समर्पण, जो व्रत की शक्ति को बढ़ा देता है कई गुना
व्रत और त्योहार

करवाचौथ व्रत :- स्त्री का संकल्प और समर्पण, जो व्रत की शक्ति को बढ़ा देता है कई गुना

दिव्यसुधा
Last updated: October 6, 2025 11:19 am
दिव्यसुधा
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करवा चौथ का व्रत स्त्री के संकल्प और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए पूरे दिन उपवास रखती हैं। व्रत की शक्ति को बढ़ाने और आस्था को मजबूत करने के लिए कथा श्रवण को आवश्यक माना गया है। करवा चौथ की कथाएं श्रद्धा और विश्वास को गहरा करती हैं और दांपत्य जीवन में प्रेम व सामंजस्य को बढ़ाती हैं। इन कथाओं में स्त्री के त्याग और समर्पण की झलक मिलती है, जिसे सुनकर मन में भक्ति और आस्था का संचार होता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले कथा सुनने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। यही कारण है कि यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है बल्कि पति-पत्नी के रिश्ते को और अधिक मजबूत बनाने का अवसर भी प्रदान करता है।

महाभारत में उल्लेख –
करवा चौथ व्रत का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने भी इस व्रत का पालन किया था। इस व्रत के देवता चंद्रमा माने गए हैं। जब अर्जुन नीलगिरि पर्वत पर तपस्या करने गए थे तब द्रौपदी चिंता और व्याकुलता से भर उठीं। इसी स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें करवा चौथ व्रत करने और चंद्रमा की पूजा करने का मार्ग बताया। जब द्रौपदी ने व्रत का पालन किया, तो कौरवों की पराजय हुई और पांडवों की विजय हुई। इसी कारण पुत्र, सौभाग्य और धन-धान्य की वृद्धि चाहने वाली स्त्रियों के लिए यह व्रत अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है।

देव पत्नियों की कथा-

करवा चौथ व्रत की कथाएं स्त्री के अटूट सतीत्व और विश्वास की गाथाएं प्रस्तुत करती हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, देव-दानव संग्राम में जब देवता लगातार पराजित हो रहे थे, तब ब्रह्मा जी की प्रेरणा से देव पत्नियों ने कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कठोर उपवास और पूजा की। उनकी सत्यनिष्ठा और आस्था के कारण ही देवताओं को विजय प्राप्त हुई। इस कथा से स्पष्ट होता है कि करवा चौथ व्रत स्त्रियों की भक्ति, समर्पण और शक्ति का प्रतीक है।

करवा चौथ की कथाएं: सतीत्व और समर्पण

करवा चौथ का व्रत भारतीय संस्कृति में स्त्री के संकल्प, समर्पण और पति के प्रति प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि स्त्रियों की भक्ति और आस्था को दर्शाता है। करवा चौथ से जुड़ी कथाएं इस व्रत की महत्ता को और स्पष्ट करती हैं। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि द्रौपदी ने भी करवा चौथ का व्रत किया था। जब अर्जुन नीलगिरि पर्वत पर तपस्या करने गए थे, तब द्रौपदी चिंता और व्याकुलता से भर गईं। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें करवा चौथ व्रत करने और चंद्रमा की पूजा करने का मार्ग बताया। द्रौपदी के व्रत और पूजा के कारण कौरवों की पराजय हुई और पांडवों की विजय सुनिश्चित हुई। यह कथा बताती है कि पति की लंबी उम्र और घर की समृद्धि के लिए स्त्रियों की आस्था और संकल्प कितना महत्वपूर्ण है। देव पत्नियों की कथा भी व्रत की महत्ता को दर्शाती है। देव-दानव संग्राम में जब देवता लगातार पराजित हो रहे थे, तब ब्रह्मा जी की प्रेरणा से देव पत्नियों ने कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कठोर उपवास और पूजा किया। उनकी निष्ठा और भक्ति के कारण देवताओं को विजय प्राप्त हुई।

करवा की कथा

करवा चौथ की कथाओं में करवा नामक स्त्री की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। करवा अपने पति से अत्यंत प्रेम करती थी और उनके सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए सदैव चिंतित रहती थी। एक दिन करवा का पति नदी में स्नान कर रहा था कि अचानक एक मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया। करवा ने अपने पतिव्रता धर्म और अदम्य साहस का परिचय देते हुए मगरमच्छ को एक कच्छे धागे से बांध दिया और यमराज से पति की रक्षा करने की प्रार्थना की। उनकी सच्ची निष्ठा और भक्ति देखकर यमराज स्वयं प्रभावित हुए। उन्होंने मगरमच्छ को दंड दिया और करवा के पति की रक्षा सुनिश्चित की।

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि करवा चौथ का व्रत केवल उपवास नहीं है, बल्कि स्त्री के संकल्प, समर्पण और पति के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक है। करवा की भक्ति और निष्ठा ने यह दिखाया कि पति की लंबी उम्र, सुरक्षा और परिवार की समृद्धि के लिए स्त्रियों की श्रद्धा और समर्पण अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि करवा चौथ का व्रत आज भी भारतीय संस्कृति में प्रमुख और पूजनीय माना जाता है।

वीरावती की कथा

करवा चौथ से जुड़ी वीरावती की कथा स्त्री के सतीत्व और भक्ति की महत्ता को दर्शाती है। वीरावती सात भाइयों की लाड़ली बहन थी और अपने पति के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए करवा चौथ व्रत रखती थी। पहले वर्ष के व्रत में, शाम तक भूख-प्यास से वह बेहोश होने लगी। उसके भाइयों ने छलपूर्वक दीपक दिखाकर चंद्रमा का आभास कराया, जिससे वीरावती ने व्रत तोड़ दिया। व्रत टूटने का दुष्प्रभाव उसके पति पर पड़ा। सच जानने के बाद वीरावती ने पश्चाताप किया और विधि-विधान से पुनः व्रत किया। इसके बाद चंद्रदेव ने उन्हें वरदान दिया और उनके पति का जीवन सुरक्षित हुआ। इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री के अंतर्मन में बिखरी हुई ऊर्जा, जब व्रत, उपवास और भक्ति के माध्यम से किसी उद्देश्य के लिए संगठित हो जाती है, तो ब्रह्मांड में कोई भी कार्य असंभव नहीं रहता। करवा चौथ का व्रत न केवल पति की लंबी उम्र और परिवार की समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह स्त्री के सतीत्व, संकल्प और समर्पण की शक्ति को भी दर्शाता है। वीरावती की भक्ति और दृढ़ संकल्प आज भी इस व्रत की महत्ता और प्रभाव को उजागर करता है।

सावित्री-सत्यवान की कथा भी करवाचौथ व्रत का प्रमुख उदाहरण है। सावित्री ने अपने पति सत्यवान के लिए पतिव्रता धर्म और तपस्या के माध्यम से यमराज को प्रसन्न किया, जिससे सत्यवान का जीवन पुनः प्राप्त हुआ।

इन कथाओं से स्पष्ट होता है कि करवा चौथ व्रत स्त्री के सतीत्व, समर्पण और भक्ति का प्रतीक है। कथा श्रवण और पूजा से स्त्रियों के मन और हृदय को शुद्धि मिलती है, पति की लंबी उम्र और परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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