सनातन धर्म में भगवान विष्णु को पालनहार कहा गया है। उनके अनंत स्वरूप हैं, जिनमें से एक दिव्य रूप है शालिग्राम भगवान। शालिग्राम को श्रीहरि विष्णु का साक्षात प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भगवान शालिग्राम का विवाह तुलसी माता से संपन्न कराया जाता है। इसे तुलसी विवाह कहा जाता है। यह पर्व भक्ति, श्रद्धा और पवित्रता का अद्भुत संगम है।
भगवान शालिग्राम का दिव्य स्वरूप
शालिग्राम कोई साधारण पत्थर नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु का ही एक जीवंत स्वरूप है। यह शिला नेपाल के गंडकी नदी के तल से प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इन शालिग्राम शिलाओं पर स्वाभाविक रूप से शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिन्ह बने होते हैं — जो स्वयं भगवान विष्णु के आयुधों का प्रतीक हैं। शालिग्राम शिलाओं की विशेषता यह है कि इनकी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें सीधे घर लाकर पूजन किया जा सकता है, क्योंकि इनमें स्वयं भगवान विष्णु का निवास माना गया है। शालिग्राम की पूजा करने से जीवन में विष्णु और लक्ष्मी दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
तुलसी विवाह का महत्व
तुलसी विवाह हर वर्ष कार्तिक मास के अंतिम दिनों में मनाया जाता है। यह पर्व धार्मिक रूप से विवाह संस्कार का प्रतीक है, जिसमें भगवान विष्णु (शालिग्राम रूप में) और माता तुलसी का पवित्र मिलन होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त तुलसी विवाह करवाता है, उसे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह विवाह घर के वातावरण को पवित्र करता है और दांपत्य जीवन में मधुरता लाता है।
शालिग्राम भगवान की उत्पत्ति कथा
शालिग्राम की कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है।
पुराणों के अनुसार, वृंदा नाम की एक महान पतिव्रता स्त्री थीं, जिनका विवाह असुरराज जालंधर से हुआ था। जालंधर को उसकी पत्नी वृंदा की पतिव्रता शक्ति से बल मिलता था, जिससे वह देवताओं तक को पराजित करने लगा। उसके अत्याचारों से सभी देवता भयभीत हो उठे। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे इस संकट से मुक्ति दिलाएं। तब भगवान विष्णु ने जालंधर को मारने की योजना बनाई।
भगवान ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा के समक्ष उपस्थित होकर उनका सतीत्व भंग कर दिया। जैसे ही वृंदा की पतिव्रता शक्ति समाप्त हुई, जालंधर युद्ध में मारा गया। लेकिन जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो उन्होंने अत्यंत क्रोध में आकर भगवान विष्णु को शिला बनने का श्राप दे दिया।
भगवान विष्णु तुरंत शिला के रूप में परिवर्तित हो गए — यही शिला शालिग्राम कहलाती है। भगवान के शिला बनने से समस्त ब्रह्मांड में संतुलन बिगड़ गया। सभी देवताओं ने वृंदा से विनती की कि वे भगवान को श्राप से मुक्त करें। वृंदा ने श्राप वापस लिया, लेकिन उसके बाद उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।
जहां वृंदा ने अपने प्राण त्यागे, वहीं तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। यह तुलसी माता का दिव्य स्वरूप माना जाता है। भगवान विष्णु ने कहा —
“हे वृंदा, तुम्हारी भक्ति और समर्पण अद्वितीय है। आज से तुम मेरे समान पूजनीय होगी। मेरा पूजन तुम्हारे बिना अधूरा रहेगा।” इसी आशीर्वाद के बाद से हर वर्ष शालिग्राम भगवान और तुलसी माता का विवाह कराए जाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
तुलसी और शालिग्राम विवाह का आध्यात्मिक संदेश
तुलसी विवाह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। वृंदा और भगवान विष्णु की कथा यह संदेश देती है कि सच्चा प्रेम कभी नष्ट नहीं होता — वह आस्था और पूजा के रूप में सदा जीवित रहता है। तुलसी माता को लक्ष्मी का रूप और शालिग्राम को विष्णु का प्रतीक माना जाता है। दोनों के मिलन से समस्त संसार में संतुलन और समृद्धि बनी रहती है।
शालिग्राम भगवान और तुलसी माता का विवाह सनातन संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि प्रेम, निष्ठा और धर्म की गहराई को दर्शाने वाला दिव्य पर्व है। जो व्यक्ति इस दिन शालिग्राम-तुलसी विवाह का आयोजन करता है, उसके घर में सदैव धन, सौभाग्य और शांति का वास रहता है।
इस प्रकार, तुलसी विवाह हमें यह सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है — क्योंकि जब प्रेम और भक्ति मिलते हैं, तब दिव्यता प्रकट होती है।