भारत की आध्यात्मिक परंपरा में 17 जनवरी का दिन अत्यंत विशेष माना जा रहा है। इस शुभ तिथि पर बिहार के चकिया-केसरिया पथ पर कैथवलिया स्थित विराट रामायण मंदिर में विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना की जाएगी। माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर होने वाला यह भव्य आयोजन न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए आस्था और गौरव का विषय है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार 17 जनवरी को मासिक शिवरात्रि का पावन संयोग बन रहा है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि मनाई जाती है, किंतु इस बार का अवसर विशेष है क्योंकि इसी दिन 33 फीट ऊंचे और 210 टन वजनी विशाल शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी।
शुभ मुहूर्त और ज्योतिषीय महत्व
मकर संक्रांति के साथ सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं, जिसे देवताओं का दिन माना गया है। उत्तरायण काल को शुभ, प्रकाशमय और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। इसी पवित्र काल में शिवलिंग की स्थापना का निर्णय लिया गया है। ज्योतिषियों के अनुसार इस दिन मूल और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का संयोग बन रहा है, जो धार्मिक कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है।
माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी भगवान शिव को समर्पित होती है। ऐसे शुभ योग में देवाधिदेव महादेव का अभिषेक और प्राण प्रतिष्ठा अत्यंत पुण्यदायी मानी जा रही है। आयोजन को लेकर मंदिर परिसर में व्यापक तैयारियाँ की जा रही हैं और देशभर से श्रद्धालु इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने पहुँच रहे हैं।
शिवलिंग की अद्भुत विशेषताएँ
विराट रामायण मंदिर में स्थापित होने वाला यह शिवलिंग अपनी विशालता और आध्यात्मिक संरचना के कारण अद्वितीय है। इसकी ऊँचाई 33 फीट और चौड़ाई भी 33 फीट है। इसका कुल वजन लगभग 210 टन है, जो इसे विश्व का सबसे विशाल शिवलिंग बनाता है।
इस भव्य शिवलिंग की एक विशेषता यह भी है कि इसमें 1008 छोटे शिवलिंग समाहित हैं। 1008 संख्या को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है, जो पूर्णता और दिव्यता का प्रतीक है। शिवलिंग के आधार पीठ की लंबाई 36 फीट है, जो स्थापना के बाद 56 फीट तक विस्तृत हो जाएगी। इस आधार पीठ को तैयार करने में लगभग दो वर्षों का समय लगा है, जो इसकी भव्यता और शिल्पकला को दर्शाता है।
निर्माण और यात्रा
इस विशाल शिवलिंग का निर्माण तमिलनाडु के महाबलीपुरम में किया गया है, जो प्राचीन शिल्पकला के लिए विश्वविख्यात है। दक्षिण भारत की परंपरागत शिल्प शैली में निर्मित यह शिवलिंग 47 दिनों की लंबी यात्रा तय कर बिहार पहुँचा है। इस दौरान अनेक स्थानों पर श्रद्धालुओं ने इसकी पूजा-अर्चना की और स्वागत किया।
आध्यात्मिक महत्व
विराट रामायण मंदिर स्वयं में एक भव्य धार्मिक परियोजना है, जहाँ भविष्य में भगवान श्रीराम के दर्शन भी संभव होंगे। ऐसे में इस पावन स्थल पर विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना सनातन धर्म की एकता और गौरव का प्रतीक बन रही है।
भगवान शिव को सृष्टि का संहारक और पुनर्सृजन का आधार माना जाता है। इतनी विशाल प्रतिमा की स्थापना न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह आध्यात्मिक जागरण का भी संदेश देती है।
17 जनवरी का यह ऐतिहासिक आयोजन देश की धार्मिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करेगा। यह क्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था, भक्ति और सनातन संस्कृति की महानता का जीवंत उदाहरण बनेगा। हर-हर महादेव!