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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > विकट संकष्टी चतुर्थी 2026: व्रत विधि, शुभ मुहूर्त और आस्था का महत्व
व्रत और त्योहार

विकट संकष्टी चतुर्थी 2026: व्रत विधि, शुभ मुहूर्त और आस्था का महत्व

Ekta Mishra
Last updated: April 5, 2026 12:34 pm
Ekta Mishra
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विकट संकष्टी चतुर्थी 2026 पूजा और व्रत का महत्व
श्रद्धा और विश्वास के साथ संकष्टी चतुर्थी व्रत, जीवन की बाधाओं को दूर करता है
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वैशाख माह की संकष्टी चतुर्थी 5 अप्रैल 2026 को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। सुबह की हल्की ठंडी हवा, मंदिरों की घंटियों की गूंज और घर-घर में पूजा की तैयारियां इस दिन को विशेष बना देती हैं। यह व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि विश्वास और आस्था का ऐसा सूत्र है, जो जीवन की परेशानियों के बीच आशा का संचार करता है।

खासतौर पर जो लोग पहली बार यह व्रत रखते हैं, उनके मन में कई सवाल होते हैं—पूजा कैसे करें, क्या चढ़ाएं और सही समय क्या है। ऐसे में यह दिन सिर्फ नियमों का पालन नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ने और मन को शांत करने का अवसर भी है।

संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथि और महत्व
इस वर्ष विकट संकष्टी चतुर्थी 5 अप्रैल, रविवार को मनाई जा रही है। यह वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि होती है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि 5 अप्रैल को दोपहर 11:59 बजे से शुरू होकर 6 अप्रैल को दोपहर 2:10 बजे समाप्त होगी।

हालांकि उदयातिथि के अनुसार तिथि 6 अप्रैल को पड़ती है, लेकिन चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा के कारण व्रत 5 अप्रैल को ही रखा जाता है। “संकष्टी” का अर्थ होता है—संकटों का नाश करने वाला। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से जीवन की बाधाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।

पूजा का शुभ समय और तैयारी
इस दिन शाम 6:20 बजे से रात 8:06 बजे तक पूजा करना सबसे शुभ माना गया है। पूजा के लिए अधिक तामझाम की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि श्रद्धा और सच्चे भाव का होना सबसे जरूरी है।

आवश्यक सामग्री में गणेश जी की मूर्ति या चित्र, रोली, चंदन, अक्षत, दूर्वा, धूप, दीपक, गंगाजल, फूल, फल और मोदक या लड्डू शामिल होते हैं। कई घरों में लोग एक दिन पहले ही पूजा की थाली सजा लेते हैं, जिससे सुबह और शाम की पूजा सहजता से हो सके।

पूजा विधि: सरल और प्रभावी तरीका
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें। शाम को एक साफ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें। गंगाजल छिड़ककर स्थान को पवित्र करें और सिंदूर का तिलक लगाएं। इसके बाद “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करते हुए 21 दूर्वा अर्पित करें। फूल, माला और मोदक का भोग लगाएं। घी का दीपक जलाकर आरती करें और व्रत कथा सुनें या पढ़ें। रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें। यह पूरी प्रक्रिया जितनी विधिपूर्ण लगती है, उतनी ही सहज भी है—बस श्रद्धा और विश्वास जरूरी है।

गणेश जी को प्रिय भोग, रंग और मंत्र
मोदक और लड्डू गणेश जी के सबसे प्रिय भोग माने जाते हैं। इसके अलावा गुड़, नारियल और तिल से बने पकवान भी अर्पित किए जा सकते हैं। फूलों में लाल रंग का विशेष महत्व होता है, जैसे गुड़हल और गेंदे के फूल शुभ माने जाते हैं। इस दिन लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है, जो ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक हैं। पूजा के दौरान “वक्रतुण्ड महाकाय”, “ॐ श्री गणेशाय नमः” और “ॐ एकदन्ताय विद्महे” जैसे मंत्रों का जाप वातावरण को शांत और सकारात्मक बनाता है। ये मंत्र मन को स्थिर करते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं।

ज्योतिषीय महत्व और लाभ
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन पूजा और व्रत करने से कुंडली में बुध और केतु से जुड़े दोष कम होते हैं। साथ ही यह व्रत मानसिक शांति, संतान सुख और जीवन में सफलता के मार्ग खोलने वाला माना जाता है।

विकट संकष्टी चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। सच्चे मन से की गई पूजा न केवल मन को शांति देती है, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति भी प्रदान करती है। यह दिन हमें यह सिखाता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ हर संकट को दूर किया जा सकता है।

TAGGED:गणेश व्रतभगवान गणेशविकट संकष्टी चतुर्थीवैशाख मासव्रत पूजाहिंदू त्योहार
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