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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > वरुथिनी एकादशी 2026: तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व
व्रत और त्योहार

वरुथिनी एकादशी 2026: तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Ekta Mishra
Last updated: April 12, 2026 12:14 pm
Ekta Mishra
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वरुथिनी एकादशी 2026 की तिथि, मुहूर्त, व्रत विधि और महत्व
वरुथिनी एकादशी 2026: तिथि, मुहूर्त और व्रत का महत्व
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हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है और वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की वरुथिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। “वरुथिनी” का अर्थ है ‘कवचधारी’, यानी यह व्रत व्यक्ति को पापों, नकारात्मक ऊर्जा, शत्रु बाधा और अज्ञात भय से सुरक्षा प्रदान करता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

तिथि और शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में एकादशी तिथि 13 अप्रैल को सुबह 1:16 बजे से शुरू होकर 14 अप्रैल को सुबह 1:08 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 13 अप्रैल 2026, सोमवार को रखा जाएगा। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 5:58 से 7:34 बजे तक रहेगा। राहुकाल सुबह 7:34 से 9:10 बजे तक और शुभ चौघड़िया 9:10 से 10:46 बजे तक है।

पारण का समय
वरुथिनी एकादशी का पारण 14 अप्रैल 2026 को सुबह 06:54 बजे से 08:31 बजे के बीच किया जाएगा। हरि वासर समाप्त होने के बाद ही पारण करना शुभ माना जाता है।

व्रत की विधि
व्रत की शुरुआत दशमी की रात से संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए करनी चाहिए। एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। दिनभर सकारात्मक विचार रखें और रात्रि में भजन-कीर्तन या जागरण करें।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान
इस दिन अनाज, शहद, प्याज और लहसुन का सेवन वर्जित होता है। झूठ बोलना, क्रोध करना और किसी की निंदा करना भी व्रत को निष्फल कर सकता है। घर में झाड़ू न लगाएं और बाल न कटवाएं, यह भी पारंपरिक नियमों में शामिल है।

क्या खाएं, क्या न खाएं
व्रत के दौरान फल, दूध और घर का बना हल्का आहार लेना श्रेष्ठ होता है। तली-भुनी चीजें, आइसक्रीम और पैकेज्ड पेय पदार्थों से दूरी बनाए रखें, ताकि शरीर और मन दोनों शुद्ध रह सकें।

विशेष मान्यता
मान्यता है कि इस दिन किया गया व्रत व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिलाता है और यदि व्रत का फल किसी दिवंगत आत्मा को समर्पित किया जाए, तो उसे सद्गति प्राप्त होती है।

वरुथिनी एकादशी का व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का माध्यम है, जो जीवन में संतुलन और सुख-समृद्धि लाने में सहायक होता है।

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