भारत अपनी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। ऐसी ही विरासत में शामिल है उत्तर प्रदेश के जौनपुर के पास स्थित त्रिलोचन महादेव मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर एक छोटे कुंड के सामने बना है और इसकी धार्मिक मान्यता बहुत गहरी है। कहा जाता है कि यहां भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ किया था, जिसके बाद शिव जी प्रकट हुए थे। मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग और कई छोटे-छोटे मंदिर भी हैं जो अन्य देवताओं को समर्पित हैं। यह मंदिर वाराणसी से लगभग 40 किलोमीटर दूर है।
कहा जाता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है, इसलिए शिवरात्रि और सावन में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इस मंदिर कि विशेषता यह है कि शिवलिंग समय के साथ बड़ा हो रहा है 60 साल पहले यह 2 फीट था और अब 3 फीट से ज्यादा हो गया है। साथ ही शिवलिंग की चमक भी बढ़ी है और उस पर भोलेनाथ की तीसरी आंख भी दिखाई देने लगी है, जिससे भक्तों की आस्था और भी मजबूत हो गई है।
स्वयं प्रगट हुए थे शिव जी
भक्तों की गहरी आस्था को देखते हुए त्रिलोचन महादेव मंदिर को अब एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। यह मंदिर कई रहस्यमयी कथाओं से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि यहां का शिवलिंग कहीं से लाया नहीं गया, बल्कि भगवान भोलेनाथ स्वयं प्रकट हुए हैं। एक समय मंदिर को लेकर पास के दो गांव रेहटी और डिंगुरपुर के बीच विवाद था कि यह मंदिर किस गांव की सीमा में आता है। कई पंचायतें हुईं लेकिन कोई हल नहीं निकला। आखिरकार तय किया गया कि इसका निर्णय भगवान शिव खुद करेंगे। दोनों गांवों ने मंदिर को बाहर से बंद कर दिया और अपने-अपने पक्ष में ताले लगा दिए। जब अगले दिन मंदिर खोला गया तो सभी ने देखा कि शिवलिंग उत्तर दिशा में, यानी रेहटी गांव की ओर झुका हुआ था। तभी से यह मंदिर रेहटी गांव का माना जाता है।
त्रिलोचन महादेव मंदिर के सामने, पूर्व दिशा में एक रहस्यमयी ऐतिहासिक कुंड है जिसमें हमेशा जल भरा रहता है। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से बुखार और चर्म रोग जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। यह मंदिर वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर से सिर्फ एक घंटे की दूरी पर है और यहां पहुंचना बहुत आसान है। सड़क मार्ग और रेल मार्ग दोनों का प्रयोग मंदिर पहुंचने के लिए किया जा सकता है।
विशेष विधि से तैयार की जाती है विभूति
भगवान शिव का सम्बंध पवित्र विभूति से भी है जिसे महाशिवरात्रि के दिन शरीर पर लगाया जाता है। महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को अर्पित की जाने वाली पवित्र विभूति विशेष विधि से तैयार की जाती है। इसे सामान्य राख नहीं माना जाता। यह विभूति सूखे गोबर के कंडों और कारुक्कई से बनाई जाती है। शिवरात्रि से पहले गोबर के कंडे तैयार कर, वैदिक मंत्रों के साथ एक पिरामिडनुमा संरचना तैयार की जाती है। जिसे ‘शिवरात्रि मुत्तन’ कहा जाता है। शिवरात्रि की सुबह विराजा होमम के बाद इसे जलाया जाता है। एक सप्ताह बाद जब यह पूरी तरह राख में बदल जाती है, तब इसे अगली पूर्णिमा पर एकत्र कर उपयोग किया जाता है। इस पवित्र विभूति को शरीर पर लगाने से कई रोगों से राहत मिलती है और इसे अत्यंत शुभ माना जाता है।