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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > सुप्तेश्वर गणेश मंदिर जबलपुर: घोड़े पर सवार कल्कि गणेश का रहस्य
मंदिर

सुप्तेश्वर गणेश मंदिर जबलपुर: घोड़े पर सवार कल्कि गणेश का रहस्य

दिव्यसुधा
Last updated: January 7, 2026 1:37 pm
दिव्यसुधा
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सुप्तेश्वर गणेश मंदिर जबलपुर में घोड़े पर सवार स्वयंभू कल्कि गणेश की दिव्य प्रतिमा
घोड़े पर सवार स्वयंभू कल्कि गणेश – जबलपुर का सुप्तेश्वर गणेश मंदिर
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सनातन परंपरा में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव माना गया है। सामान्यतः भगवान गणेश को उनके वाहन मूषक के साथ देखा जाता है, लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में स्थित सुप्तेश्वर गणेश मंदिर में भगवान गणेश एक बिल्कुल अलग और अद्भुत स्वरूप में विराजमान हैं। यहां भगवान गणेश मूषक नहीं, बल्कि घोड़े पर सवार हैं, इसी कारण उनकी पूजा “कल्कि गणेश” के रूप में की जाती है।

स्वयंभू प्रतिमा और प्राकृतिक मंदिर
जबलपुर के रतन नगर की पहाड़ियों पर स्थित सुप्तेश्वर गणेश मंदिर में भगवान गणेश की स्वयंभू शिला स्वरूप प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा लगभग 50 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मान्यता है कि भगवान गणेश का अधिकांश शरीर धरती के भीतर समाया हुआ है और केवल उनकी विशाल सूंड ही धरती के ऊपर दिखाई देती है। यह मंदिर लगभग डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी विशेषता यह है कि यहां कोई गुंबद या दीवार नहीं, बल्कि प्राकृतिक पहाड़ी में स्थित उसी स्वरूप में भगवान की पूजा होती है।

मंदिर स्थापना की रोचक कथा
मंदिर की स्थापना से जुड़ी कथा अत्यंत रोचक और श्रद्धा से परिपूर्ण है। कहा जाता है कि कुछ वर्ष पूर्व रतन नगर की पहाड़ियों को अवैध रूप से तोड़ा जा रहा था। उसी दौरान एक महिला को एक शिला पर भगवान गणेश के दर्शन हुए। उन्होंने वहीं पूजा-अर्चना शुरू की और धीरे-धीरे इस स्थान की ख्याति फैलने लगी। भक्तों की मन्नतें पूरी होने लगीं और श्रद्धालुओं की संख्या निरंतर बढ़ती चली गई।

पहली पूजा और विकास यात्रा
मान्यता के अनुसार प्रेम नगर निवासी बुजुर्ग सुधा अविनाश राजे को भगवान गणेश ने स्वप्न में दर्शन दिए थे। स्वप्न के निर्देश पर वे रतन नगर की पहाड़ी पर पहुंचीं, जहां उन्हें वही शिला स्वरूप प्रतिमा दिखाई दी। उन्होंने 4 सितंबर 1989 को गंगाजल और नर्मदा जल से शिला का अभिषेक कर सिंदूर और घी अर्पित कर पहली पूजा की। इसके बाद भक्तों की आस्था बढ़ती गई और वर्ष 2009 में सुप्तेश्वर विकास समिति का गठन हुआ, जिससे मंदिर का स्वरूप और अधिक व्यवस्थित एवं भव्य हुआ।

सिंदूर चढ़ाने की परंपरा और मान्यताएं
सुप्तेश्वर गणेश मंदिर में भक्त 40 दिनों तक नियमित पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाओं के लिए अर्जी लगाते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई साधना अवश्य फल देती है। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त भगवान को सिंदूर, झंडा और वस्त्र अर्पित करते हैं। वर्ष में हर तीन महीने में एक बार विशेष सिंदूर चढ़ाने की रस्म निभाई जाती है।

पर्व और विशेष अनुष्ठान
मंदिर के पुजारी मदन तिवारी के अनुसार गणेशोत्सव के दौरान प्रतिदिन सुबह धार्मिक अनुष्ठान और शाम को भव्य महाआरती का आयोजन होता है। गणेश चतुर्थी से लेकर 11 दिनों तक विशेष पूजा होती है। प्रत्येक माह गणेश चतुर्थी पर महाआरती, साथ ही श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भी यहां विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।

आस्था और चमत्कार का संगम
सुप्तेश्वर गणेश मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, चमत्कार और दिव्य अनुभूति का केंद्र है। यहां आने वाले भक्त मानते हैं कि भगवान कल्कि गणेश अपने भक्तों की हर सच्ची मनोकामना पूर्ण करते हैं और जीवन के विघ्नों को दूर कर मार्ग प्रशस्त करते हैं।

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