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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > नारद मुनि: सृष्टि के पहले पत्रकार होने का रहस्य
व्रत और त्योहार

नारद मुनि: सृष्टि के पहले पत्रकार होने का रहस्य

दिव्यसुधा
Last updated: May 13, 2025 12:38 pm
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Written By : Ekta Mishra

नारद जयंती 2025 में 13 मई को मनाई जाएगी। नारद मुनि हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में एक खास स्थान रखते हैं। वे भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे और उन्हें संगीत और वेद-शास्त्रों का गहरा ज्ञान था। नारद मुनि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे। उन्होंने कठोर तप कर ब्रह्मर्षि का दर्जा पाया और उन्हें देवर्षि कहा जाता है। यह पद उन्हें मिला क्योंकि वे तीनों काल—भूत, भविष्य और वर्तमान—के जानकार थे। आइए, नारद मुनि से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं।

सृष्टि के पहले पत्रकार नारद मुनि थे

देवर्षि नारद को सृष्टि का पहला पत्रकार कहा जाता है क्योंकि वे तीनों लोकों – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल – में स्वतंत्र रूप से विचरण करते थे और एक लोक की खबर दूसरे लोक तक पहुंचाते थे। वे देवताओं, ऋषियों, असुरों और मनुष्यों के बीच संवाद का माध्यम बनते थे। नारद मुनि न केवल घटनाओं की जानकारी देते थे, बल्कि उसका विश्लेषण भी करते थे और उसे आगे बढ़ाते थे। हिंदू धर्म के शास्त्रों में कई ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहां नारद मुनि ने किसी घटना की जानकारी देकर आगे की बड़ी घटनाओं की नींव रखी। इसलिए उन्हें संवाद, सूचना और ज्ञान के देवदूत के रूप में सम्मानित किया जाता है, और इसी कारण उन्हें सृष्टि का पहला पत्रकार माना गया है।

नारद मुनि थे ज्ञान के भंडार

महाभारत के सभापर्व में नारद मुनि के अद्वितीय व्यक्तित्व और ज्ञान का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें बताया गया है कि नारद मुनि उपनिषदों और वेदों के गहरे जानकार थे। वे न केवल वर्तमान बल्कि भूतकाल (पूर्व कल्प) की घटनाओं की भी जानकारी रखते थे। इतिहास, पुराण, व्याकरण, ज्योतिष और आयुर्वेद जैसे विषयों में भी उनका गहन अध्ययन था। नारद मुनि योग और संगीत की विद्या में भी निपुण थे। उनके इस बहुआयामी ज्ञान और तप के कारण देवता, दानव, मनुष्य और सभी प्राणी उन्हें पूजते थे। तीनों लोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल – में नारद मुनि को विशेष सम्मान प्राप्त था। उनका जीवन ज्ञान, भक्ति और सेवा का प्रतीक माना जाता है।

इस वजह से नहीं किया विवाह

नारद मुनि आजीवन अविवाहित रहे। ऐसा माना जाता है कि वे भगवान की भक्ति और सेवा में पूरी तरह समर्पित रहना चाहते थे, इसलिए उन्होंने विवाह नहीं किया। पुराणों में एक प्रसंग आता है जिसमें ब्रह्मा जी ने नारद मुनि से विवाह करने को कहा था, लेकिन नारद ने साफ इंकार कर दिया। ब्रह्मा जी ने कई बार समझाने की कोशिश की, पर जब नारद नहीं माने तो उन्होंने नारद को श्राप दे दिया कि वे जीवन भर अविवाहित रहेंगे। इस कारण नारद मुनि ने कभी विवाह नहीं किया और वे पूरी तरह से भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर चल पड़े।

महान वीणा वादक

नारद मुनि को एक महान वीणावादक माना जाता है। वे वीणा बजाने में इतने निपुण थे कि उनकी वीणा की धुन सुनकर देवता, ऋषि-मुनि और सभी प्राणी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। ऐसा माना जाता है कि उन्हें संगीत की शिक्षा स्वयं मां सरस्वती ने दी थी। उनकी वीणा का नाम ‘महती’ था, और वे अक्सर भजन गाते हुए “नारायण-नारायण” का जप करते दिखाई देते थे। नारद मुनि की संगीत साधना उन्हें देवताओं और ऋषियों के बीच विशेष सम्मान दिलाती थी।

भगवान विष्णु को इसलिए दिया श्राप

नारद जी भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे। एक बार उन्हें लगा कि उन्होंने वासना (काम) पर पूरी तरह जीत पा ली है। यह सोचकर उन्हें अहंकार हो गया। भगवान विष्णु ने उनका घमंड तोड़ने के लिए एक लीला की। विष्णु भगवान ने एक सुंदर राज्य बनाया, जहां एक सुंदर राजकुमारी का स्वयंवर हो रहा था। नारद जी वहां पहुंचे और राजकुमारी को देखकर उस पर मोहित हो गए। उन्होंने सोचा कि वह उससे शादी करना चाहते हैं।इसके लिए नारद जी विष्णु लोक गए और भगवान विष्णु से कहा कि उन्हें सुंदर चेहरा दे दें ताकि राजकुमारी उन्हें पसंद कर ले।

नारद जी ने भगवान विष्णु से सुंदर रूप मांगा था, लेकिन भगवान ने उनकी भलाई के लिए उन्हें बंदर का चेहरा दे दिया। स्वयंवर में जब नारद पहुंचे तो लोग उनका मजाक उड़ाने लगे। अंत में भगवान विष्णु ने ही उस राजकुमारी से विवाह कर लिया। जब नारद जी को सच पता चला, तो उन्हें बहुत दुख हुआ और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि एक दिन आपको भी अपनी पत्नी से बिछड़ना पड़ेगा और उसका दुख सहना होगा। माना जाता है कि इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु को जब राम के रूप में जन्म लेना पड़ा, तो उन्हें सीता जी का वियोग सहना पड़ा।

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