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दिव्य सुधा > आरती/मंत्र > श्रीराधा मंत्र: जप विधि, लाभ और भक्ति मार्ग का महत्व
आरती/मंत्र

श्रीराधा मंत्र: जप विधि, लाभ और भक्ति मार्ग का महत्व

Ekta Mishra
Last updated: February 26, 2026 5:58 pm
Ekta Mishra
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श्रीराधा का दिव्य स्वरूप और राधा मंत्र जप करते हुए भक्त
श्रीराधा की आराधना से प्राप्त होता है प्रेम, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद।
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भक्ति मार्ग में श्रीराधा का स्थान अत्यंत उच्च और अलौकिक माना गया है। वे केवल भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी ही नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक शक्ति, करुणा और प्रेम की मूर्त स्वरूप हैं। शास्त्रों के अनुसार श्रीराधा का प्राकट्य स्वयं श्रीकृष्ण के वाम अंग से हुआ, इसलिए वे श्रीकृष्णस्वरूपा कही जाती हैं। राधा-कृष्ण का संबंध सांसारिक नहीं, बल्कि शुद्ध, निष्कलुष और दिव्य प्रेम का प्रतीक है।

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं महादेव से कहा था “यदि मुझे वश में करना चाहते हो तो मेरी प्रियतमा श्रीराधा का आश्रय ग्रहण करो।” यह कथन इस बात का प्रमाण है कि श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने का सरलतम मार्ग श्रीराधा की आराधना है। इसी प्रकार श्रीराधा को प्रसन्न करने के लिए श्रीकृष्ण का ध्यान भी आवश्यक है। वैष्णव परंपरा में इस युगल स्वरूप की उपासना को परम श्रेष्ठ माना गया है।

श्रीराधा के मंत्रों का नियमित जप साधक के जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकता है। यह मंत्र न केवल मन को शुद्ध करते हैं, बल्कि जीवन के अमंगल को दूर कर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। श्रद्धा और नियमपूर्वक जप करने से अंत:करण में प्रेम, शांति और समर्पण की भावना जागृत होती है।

षडक्षर राधा मंत्र
“श्रीराधायै स्वाहा।”
यह मंत्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को प्रकाशित करने वाला माना गया है। इसका 108 बार जप विशेष फलदायी होता है।

सप्ताक्षर राधा मंत्र
“ऊं ह्नीं राधिकायै नमः।”
“ऊं ह्नीं श्रीराधायै स्वाहा।”

इन मंत्रों का जप जीवन में समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करने वाला माना गया है। सच्चे मन से जप करने पर आर्थिक और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है।

अष्टाक्षर राधा मंत्र
“ऊं ह्नीं श्रीराधिकायै नमः।”
“ऊं ह्नीं श्रीं राधिकायै नमः।”

यह मंत्र सर्वकार्य सिद्धि के लिए प्रसिद्ध है। निरंतर जप से साधक को कार्यों में सफलता, आत्मविश्वास और दिव्य संरक्षण का अनुभव होता है।

शास्त्रों में ब्रह्मा और विष्णु द्वारा भी श्रीराधा की वंदना का वर्णन मिलता है
“नमस्त्रैलोक्यजननि प्रसीद करुणार्णवे…”
अर्थात हे त्रैलोक्यजननी, करुणामयी माता! आप परमानंद और कृपा की सागर हैं, हमें अपना आशीर्वाद प्रदान करें।

श्रीराधा का स्मरण केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को परम प्रेम से जोड़ने का माध्यम है। जब साधक “राधे” नाम का जप करता है, तो उसके भीतर छिपी करुणा, भक्ति और समर्पण की शक्ति जागृत होती है। नियमित मंत्र जप से मन की चंचलता शांत होती है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

अंततः, श्रीराधा की उपासना हमें यह सिखाती है कि परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग प्रेम, विनम्रता और निष्काम भक्ति से होकर जाता है। जो साधक श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, वह धीरे-धीरे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर दिव्य आनंद का अनुभव करने लगता है।

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