महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और भक्त व्रत रखकर विधि-विधान से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, फल, मिष्ठान और अन्य नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। लेकिन शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को लेकर लोगों के मन में अक्सर एक प्रश्न उठता है क्या इसे ग्रहण करना चाहिए या नहीं? इस विषय में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं इस संबंध में शिव पुराण में क्या कहा गया है।
शिव पुराण के अनुसार प्रसाद का महत्व
शिव पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति भगवान शिव का सच्चा भक्त है और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करता है, उसे भगवान का प्रसाद अवश्य ग्रहण करना चाहिए। मान्यता है कि शिव पर चढ़े प्रसाद के दर्शन मात्र से भी मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि श्रद्धा और विनम्रता के साथ उस प्रसाद को ग्रहण किया जाए, तो करोड़ों पुण्य की प्राप्ति होती है।
प्रसाद को सदैव सिर झुकाकर और प्रसन्न मन से स्वीकार करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति सामने उपस्थित प्रसाद को यह कहकर टाल देता है कि वह बाद में ग्रहण करेगा, वह पुण्य से वंचित रह जाता है। भगवान का प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि दिव्य कृपा का प्रतीक माना गया है।
दीक्षित भक्तों के लिए विशेष महत्व
शिव पुराण के अनुसार, जिन्होंने भगवान शिव की दीक्षा ग्रहण की है, उनके लिए शिवलिंग पर चढ़ाया गया नैवेद्य महाप्रसाद के समान होता है। ऐसे भक्तों को प्रसाद ग्रहण करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। यहां तक कि शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर पापों से ग्रसित हो, लेकिन वह पवित्र भाव से शिव का प्रसाद ग्रहण करे, तो उसके पाप भी क्षीण हो सकते हैं।
किन शिवलिंगों का प्रसाद न ग्रहण करें?
शिव पुराण में कुछ विशेष स्थितियों का भी वर्णन मिलता है। मिट्टी या साधारण पत्थर से बने शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद सामान्यतः ग्रहण नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसे शिवलिंगों पर अर्पित नैवेद्य शिवगणों को समर्पित होता है। जहां ‘चंड’ का अधिकार माना जाता है, वहां के प्रसाद को साधारण मनुष्यों द्वारा ग्रहण करना उचित नहीं बताया गया है। ऐसा करने से जीवन में बाधाएं और कष्ट आ सकते हैं।
किन शिवलिंगों का प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है?
नर्मदा नदी से प्राप्त पत्थर (नर्मदेश्वर शिवलिंग) से बने शिवलिंग का प्रसाद ग्रहण करना शुभ माना गया है। इसके अतिरिक्त चांदी, तांबा या पीतल जैसी धातुओं से निर्मित शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद भी ग्रहण किया जा सकता है। सिद्ध पुरुषों द्वारा स्थापित शिवलिंग पर अर्पित नैवेद्य भी ग्रहण करने योग्य होता है।
भगवान शिव की मूर्ति या चित्र पर चढ़ाया गया प्रसाद भी स्वीकार्य माना गया है, क्योंकि वहां ‘चंड’ का अधिकार नहीं होता। इस प्रकार उस प्रसाद को लेने में कोई दोष नहीं है।
प्रसाद ग्रहण करने का नियम
शिव पुराण में वर्णित है कि जो भक्त विधिपूर्वक शिवलिंग का स्नान कराकर तीन बार आचमन करता है, उसके शरीर, वाणी और मन के पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि जो प्रसाद सामान्यतः ग्रहण योग्य न माना जाए, वह शालिग्राम के स्पर्श से ग्रहण करने योग्य बन जाता है।
महाशिवरात्रि जैसे पावन अवसर पर भगवान शिव का प्रसाद श्रद्धा, विश्वास और विनम्रता के साथ ग्रहण करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार प्रसाद भगवान की कृपा का प्रतीक है और इसे अस्वीकार करना उचित नहीं माना गया है। हालांकि, शिव पुराण में वर्णित नियमों का ध्यान रखते हुए ही प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। आस्था और मर्यादा के साथ किया गया प्रत्येक कर्म ही सच्ची भक्ति का प्रतीक है।