सनातन परंपरा में देवी शक्ति की उपासना को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। देवी के विभिन्न स्वरूप अपने भक्तों को अलग-अलग प्रकार के वरदान प्रदान करते हैं। इन्हीं दिव्य स्वरूपों में से एक हैं माता शीतला, जिनकी पूजा आरोग्य, सुख-समृद्धि और रोगों से मुक्ति के लिए की जाती है। शक्ति साधना के अनेक रूपों में माता शीतला की पूजा, जप और तप का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि माता शीतला की कृपा से भक्तों को न केवल रोगों से मुक्ति मिलती है, बल्कि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि भी प्राप्त होती है।
देवी दुर्गा के इस पवित्र स्वरूप की पूजा के लिए चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को विशेष माना गया है। इस दिन शीतला अष्टमी या बसौड़ा का व्रत रखा जाता है। पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन भक्त विधि-विधान से माता शीतला की पूजा करते हैं और उनसे परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करते हैं। आइए जानते हैं शीतला अष्टमी व्रत और पूजा से जुड़ी सात महत्वपूर्ण बातें।
शीतला अष्टमी का व्रत कब रखा जाता है
शीतला अष्टमी का व्रत सामान्यतः होली के आठवें दिन रखा जाता है। यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त सुबह स्नान करके माता शीतला की पूजा करते हैं और पूरे दिन श्रद्धा और नियम के साथ व्रत रखते हैं। इस वर्ष यह पावन पर्व 11 मार्च 2026 को पड़ रहा है, जिसे बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है।
शीतला माता की पूजा क्यों की जाती है
सनातन धर्म में माता शीतला को रोगों को दूर करने वाली देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उनकी पूजा से चेचक, खसरा और अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा होती है। माता शीतला को ‘आरोग्य की देवी’ भी कहा जाता है। श्रद्धालु इस दिन उनकी पूजा करके अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य तथा दीर्घायु की कामना करते हैं।
पूजा में लगाया जाता है बासी भोग
शीतला अष्टमी की सबसे विशेष परंपरा यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। भक्त एक दिन पहले ही भोजन और पकवान बनाकर रखते हैं और अगले दिन वही बासी भोजन माता को भोग के रूप में अर्पित करते हैं। पूजा के बाद इसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इसी कारण इस पर्व को बसौड़ा कहा जाता है। इसके साथ ही इस दिन गर्म पानी से स्नान करने से भी बचने की परंपरा मानी जाती है।
शीतला माता के प्रमुख मंदिर
भारत में माता शीतला के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इनमें हरियाणा के गुरुग्राम स्थित शीतला माता मंदिर, उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले का कड़ा धाम और राजस्थान के चाकसू कस्बे का शीतला माता मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन स्थानों पर शीतला अष्टमी के अवसर पर विशाल मेलों और विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।
शीतला अष्टमी के दिन न करें ये काम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन कुछ कार्यों से बचना चाहिए। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और झाड़ू लगाने से भी परहेज किया जाता है। साथ ही सुई में धागा डालना भी शुभ नहीं माना जाता। मान्यता है कि माता शीतला की सवारी गधा है, इसलिए इस दिन गधे को परेशान करना या उसे कष्ट देना भी वर्जित माना गया है।
शीतला अष्टमी व्रत का धार्मिक महत्व
हिंदू मान्यता के अनुसार जो भक्त श्रद्धा और नियम के साथ शीतला अष्टमी का व्रत रखते हैं, उन्हें माता शीतला का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। उनकी कृपा से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और व्यक्ति शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। यह व्रत परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण के लिए भी अत्यंत फलदायी माना गया है।
शीतला अष्टमी का आध्यात्मिक संदेश
माता शीतला को अक्सर हाथ में झाड़ू और शीतल जल से भरा पात्र धारण किए हुए दर्शाया जाता है। यह प्रतीक हमें स्वच्छता और स्वास्थ्य का महत्व समझाते हैं। इस पर्व के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया जाता है कि साफ-सफाई और संतुलित जीवनशैली अपनाकर ही रोगों से बचा जा सकता है। इस प्रकार शीतला अष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और जागरूकता का भी प्रतीक है। इस तरह शीतला अष्टमी का यह पावन पर्व श्रद्धा, आस्था और लोकपरंपरा का अद्भुत संगम है, जो भक्तों को आरोग्य, सुख और सकारात्मक जीवन की प्रेरणा देता है।