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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > शीतला अष्टमी 2026: बसौड़ा पूजा का महत्व, व्रत विधि और बासी भोजन की परंपरा
व्रत और त्योहार

शीतला अष्टमी 2026: बसौड़ा पूजा का महत्व, व्रत विधि और बासी भोजन की परंपरा

Ekta Mishra
Last updated: March 6, 2026 11:44 am
Ekta Mishra
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माता शीतला की पूजा करते भक्त और बसौड़ा पूजा में चढ़ाया गया बासी भोजन प्रसाद
शीतला अष्टमी पर माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाकर आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
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हिंदू धर्म में प्रत्येक व्रत और पर्व का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। इन्हीं पावन पर्वों में से एक है शीतला अष्टमी, जिसे कई स्थानों पर बसौड़ा या बसियौरा के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से रोगों से मुक्ति, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। शीतला अष्टमी का पर्व माता शीतला को समर्पित होता है, जिन्हें रोगों का नाश करने वाली देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियमों के साथ इस दिन माता शीतला की पूजा करते हैं, उन्हें आरोग्य, सौभाग्य और परिवार में सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

शीतला अष्टमी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च, बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पड़ती है। अष्टमी तिथि का प्रारंभ 11 मार्च 2026 को पूर्वाह्न 01:54 बजे से होगा और इसका समापन 12 मार्च 2026 को भोर 04:19 बजे पर होगा। उदया तिथि के आधार पर शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च को ही किया जाएगा। इस दिन माता शीतला की पूजा का शुभ समय प्रातः 06:36 बजे से सायं 06:27 बजे तक रहेगा, जो पूरे दिन पूजा-अर्चना के लिए अनुकूल माना गया है।

बसौड़ा पूजा और बासी भोजन की परंपरा
शीतला अष्टमी को बसौड़ा पूजा भी कहा जाता है। ‘बसौड़ा’ शब्द का अर्थ ही बासी या पहले से बना हुआ भोजन होता है। इस दिन विशेष रूप से माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा सुनने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे एक गहरी धार्मिक कथा और आस्था जुड़ी हुई है।

लोक मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में एक गांव के लोगों ने शीतला अष्टमी के दिन माता को प्रसन्न करने के लिए ताजा और गरम भोजन का भोग लगाया। लेकिन गरम भोजन से माता का मुख जल गया और वे क्रोधित हो गईं। मान्यता है कि माता के क्रोध के कारण उस गांव में भीषण आग लग गई, जिससे लगभग पूरे गांव के घर जलकर राख हो गए। केवल एक बुजुर्ग महिला की झोपड़ी ही सुरक्षित बची रही।

जब ग्रामीणों ने उस बुजुर्ग महिला से इसका कारण पूछा, तो उसने बताया कि उसके पास ताजा भोजन बनाने के साधन नहीं थे। इसलिए उसने माता को बासी भोजन का ही भोग लगा दिया था। इससे माता प्रसन्न हो गईं और उनकी झोपड़ी को किसी प्रकार की हानि नहीं हुई। तभी से यह परंपरा प्रचलित हो गई कि शीतला अष्टमी के दिन माता को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है।

शीतला अष्टमी व्रत की विधि
शीतला अष्टमी के व्रत को विधि-विधान से करने के लिए भक्तों को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करना चाहिए और माता शीतला की पूजा का संकल्प लेना चाहिए। इस व्रत में एक विशेष नियम यह भी है कि पूजा में चढ़ाई जाने वाली सभी भोग सामग्री एक दिन पहले ही तैयार कर ली जाती है। अगले दिन उसी बासी भोजन को माता को अर्पित किया जाता है।

पूजा के समय माता शीतला को दाल-भात, मालपुआ, मिठाई, फल और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ ही शीतला माता की कथा सुनना या पढ़ना तथा शीतला स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। अंत में माता की आरती की जाती है और उनसे परिवार के सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है।

शीतला अष्टमी का धार्मिक महत्व
शीतला अष्टमी का व्रत केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि यह आस्था और विश्वास का प्रतीक है। माना जाता है कि माता शीतला की कृपा से व्यक्ति को रोगों से मुक्ति, मानसिक शांति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ माता शीतला की पूजा कर उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं। इस प्रकार शीतला अष्टमी का पर्व हमें यह संदेश देता है कि श्रद्धा, विश्वास और नियमों के साथ की गई पूजा जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि लेकर आती है।

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