मथुरा और वृंदावन की धरा एक बार फिर अध्यात्म और भक्ति से सराबोर हो उठी, जब बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के नेतृत्व में निकली सनातनी एकता पदयात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँची। दस दिनों में 150 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे देश के सनातनियों को एक सूत्र में बाँधने का विराट संदेश बन गई। लाखों श्रद्धालु—न केवल भारत के विभिन्न राज्यों से बल्कि नेपाल सहित अन्य देशों से भी—इस ऐतिहासिक पदयात्रा का हिस्सा बने।
एकता का संदेश और आस्था की हुंकार
29 वर्ष के युवा संत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने सनातन धर्म की एकता का जो आह्वान किया, उसकी प्रतिध्वनि पूरे राष्ट्र में फैल गई। उनकी अगुवाई में निकली पदयात्रा जब वृंदावन पहुँची, तो पूरा शहर भगवामय हो उठा। सड़कें, गलियाँ, मंदिरों की परिक्रमा मार्ग—सब पर भगवा ध्वज, जयकारों की गूंज और श्रद्धालुओं की लंबी कतार दिखाई दी। “हिंदू हैं हम… और जो राम का नहीं, वह किसी काम का नहीं” जैसे नारे श्रद्धालुओं के उत्साह और धर्मप्रेम को उजागर करते रहे।
वृंदावन में लघु भारत का संगम
यात्रा के अंतिम दिन राधा माधव मंदिर से सुबह आरंभ हुई पदयात्रा आगे बढ़ते हुए छटीकरा मोड़ तक पहुँची, जहाँ श्रद्धालुओं की उमड़ी अपार भीड़ के चलते पुलिस बैरिकेडिंग भी टूट गई। सिक्किम, कर्नाटक, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, नेपाल—प्रत्येक दिशा से आए भक्तों ने यात्रा को एकता, संस्कृति और भक्ति का विशाल संगम बना दिया। यह दृश्य ऐसा था जैसे पूरा भारत अपनी मूल सनातनी पहचान को एक साथ जी रहा हो।
आस्था से भरी व्यक्तिगत यात्राएँ
इस पदयात्रा में शामिल हर व्यक्ति अपने भीतर एक अलग भाव लेकर आया था।
जयपुर की सुनीता मीणा ने बताया कि वे कई महीनों से धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के दर्शन करना चाहती थीं। बागेश्वर धाम जाकर भी मुलाकात नहीं हो सकी, इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि वे उनकी इस यात्रा का हिस्सा बनेंगी। दस दिन तक चलने के बाद भी उनके चेहरे पर वही ऊर्जा थी—”जो आनंद इस यात्रा में मिला, वह कहीं और नहीं। अब हर यात्रा में साथ चलेंगे,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ से आए नाथूराम और दिवाकर, जो खेती करते हैं, ने बताया कि यह भीड़ किसी के बुलावे से नहीं आई—”धर्म स्वयं हमें यहाँ खींच लाया है।”
भजन, भक्ति और दिव्य वातावरण
यात्रा के अंतिम दिन इस्कॉन गुरुकुल के विदेशी बालकों द्वारा सड़क किनारे बैठकर पारंपरिक ढोलक और मंजीरे के साथ भजन गाए गए, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने। भक्त थकान भूलकर उन्हें सुनने बैठ गए। इस दृश्य ने यह सिद्ध कर दिया कि सनातन धर्म केवल भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं—यह एक वैश्विक चेतना है, जो हर हृदय को जोड़ती है।
सनातनी एकता पदयात्रा केवल कदमों की यात्रा नहीं थी, यह हृदयों के मिलन का उत्सव थी। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के नेतृत्व में हुए इस आयोजन ने राष्ट्र को यह संदेश दिया कि सनातनी परंपरा एक है, और जब हम एक साथ खड़े होते हैं तो हमारी शक्ति असीम होती है। वृंदावन की पवित्र भूमि पर सम्पन्न यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सनातन धर्म की एकता, प्रेम और सामर्थ्य का प्रतीक बन चुकी है।