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दिव्य सुधा > अन्य > साधना में फल की चिंता नहीं, भाव की शुद्धता है सबसे महत्वपूर्ण
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साधना में फल की चिंता नहीं, भाव की शुद्धता है सबसे महत्वपूर्ण

Ekta Mishra
Last updated: February 23, 2026 1:54 pm
Ekta Mishra
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साधना और पूजा में भाव की शुद्धता और समर्पण का महत्व दर्शाता चित्र
साधना का असली महत्व: फल नहीं, भावना की शुद्धता
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मनुष्य जब ज्योतिषीय उपाय करता है या ईश्वर की पूजा-पाठ में संलग्न होता है, तो उसके मन में सबसे पहले यही प्रश्न उठता है—“ इसका फल कब मिलेगा?” यह प्रश्न स्वाभाविक अवश्य है, किंतु कई बार यही जिज्ञासा साधना की सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। आज के समय में लोग मंत्र जाप, अनुष्ठान या अन्य उपायों को त्वरित समाधान की तरह देखने लगे हैं, मानो कोई बटन दबाते ही समस्या समाप्त हो जाएगी। जबकि सत्य यह है कि आध्यात्मिक उपाय कोई जादुई प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्म-संशोधन और कर्म सुधार की यात्रा हैं।

जब तक साधक भीतर से परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होता, तब तक बाहरी उपाय सीमित प्रभाव ही दे पाते हैं। कई बार उपाय विधि-विधान से किया जाता है, मंत्र शुद्ध होता है, समय भी अनुकूल होता है, फिर भी अपेक्षित फल प्राप्त नहीं होता। इसका कारण अक्सर साधक का अस्थिर मन, अधैर्य या अहंकार होता है। साधना केवल क्रिया नहीं, बल्कि भाव की पवित्रता का विषय है।

ऐसी स्थिति में यदि लाभ कम प्रतीत हो, तो बार-बार नए उपाय खोजने के बजाय क्षमा-प्रार्थना करना अधिक सार्थक होता है। प्रभु से विनम्र होकर कहना चाहिए “हे ईश्वर! मुझसे ज्ञात-अज्ञात जो भी भूलें हुई हों, उन्हें क्षमा करें। मुझे सद्बुद्धि दें, ताकि मैं अपने दोषों को पहचान सकूं और स्वयं को सुधार सकूं।” यह स्वीकार भाव ही साधना को पुनः जीवंत कर देता है।

अनेक दोष ऐसे होते हैं, जिनका ज्ञान हमें नहीं होता पूर्व जन्म के कर्म, अवचेतन प्रवृत्तियां या अनजाने में किए गए मानसिक अपराध। जब साधक यह मान लेता है कि वह सब जानता है, वहीं उसकी आध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है। परंतु जब वह विनम्र होकर स्वीकार करता है कि उसे अभी सीखना है, तब ईश्वर की कृपा का मार्ग खुलता है।

ज्योतिषीय उपाय तभी सिद्ध होते हैं, जब वे श्रद्धा, धैर्य और विनय के साथ किए जाएं। केवल विधि का पालन पर्याप्त नहीं, भाव की निर्मलता अनिवार्य है। जिस दिन साधक फल की अपेक्षा छोड़कर आत्म-शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करता है, उसी दिन से उसके प्रयास फलित होने लगते हैं।

अंततः साधना का उद्देश्य समस्या का त्वरित समाधान नहीं, बल्कि स्वयं के स्वभाव और प्रवृत्तियों को परिष्कृत करना है। शास्त्रों में कहा गया है कि ईश्वर गणना नहीं, भावना देखते हैं। यदि पूजा-पाठ में अहंकार, संदेह या अधैर्य हो, तो फल मिलने में विलंब स्वाभाविक है। इसलिए साधना करते समय धैर्य, समर्पण और विनम्रता को अपनाना ही सच्ची सफलता की कुंजी है।

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