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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > सबरीमाला मंदिर: तप, संयम और दिव्य आस्था का अद्वितीय तीर्थ
मंदिर

सबरीमाला मंदिर: तप, संयम और दिव्य आस्था का अद्वितीय तीर्थ

Ekta Mishra
Last updated: February 19, 2026 11:02 am
Ekta Mishra
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केरल के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए पहुंचे श्रद्धालु
स्वामीये शरणम् अयप्पा — तप, संयम और आस्था का अद्वितीय तीर्थ
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भारत की आध्यात्मिक परंपरा में तीर्थयात्रा केवल देवदर्शन का साधन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, अनुशासन और तपस्या का मार्ग मानी जाती है। इन्हीं पवित्र धामों में दक्षिण भारत का सुप्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर विशेष स्थान रखता है। केरल राज्य के पथनमथिट्टा जिले के घने पर्वतीय अंचल में लगभग 3000 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह पावन धाम भगवान अयप्पा को समर्पित है। चारों ओर अठारह पहाड़ियों से घिरा यह मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा, साधना और समर्पण का सजीव प्रतीक है।

41 दिवसीय दीक्षा: आत्मानुशासन की साधना
सबरीमाला की सबसे विशिष्ट परंपरा इसकी 41 दिवसीय दीक्षा (व्रतम) है। इस व्रत को धारण करने वाला भक्त ब्रह्मचर्य का कठोर पालन करता है, सात्विक भोजन ग्रहण करता है, काले या नीले वस्त्र पहनता है और मन, वाणी तथा कर्म की शुद्धि का अभ्यास करता है। यह अवधि आत्मसंयम और आध्यात्मिक जागरण का समय होती है। भक्त जप, तप, ध्यान और सेवा के माध्यम से अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर करने का प्रयास करता है।

यह व्रत केवल बाहरी नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनोविकारों काम, क्रोध, लोभ और अहंकार पर नियंत्रण का अभ्यास भी है। इस साधना के पश्चात तीर्थयात्री शारीरिक और मानसिक रूप से सबरीमाला यात्रा के लिए तैयार होता है।

हरिहर पुत्र भगवान अयप्पा
मंदिर में विराजमान भगवान अयप्पा को “हरिहर पुत्र” कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार वे भगवान शिव और भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार के दिव्य संयोग से उत्पन्न हुए। इस प्रकार उनमें शिव की तपस्या और वीरता तथा विष्णु की करुणा और संतुलन दोनों शक्तियों का अद्भुत समन्वय है।

भगवान अयप्पा को धर्मशास्ता भी कहा जाता है, जो धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के प्रतीक हैं। वे शांति और शक्ति, करुणा और पराक्रम दोनों के अद्वितीय संगम माने जाते हैं।

महिषी वध और ब्रह्मचर्य का व्रत
पौराणिक कथा के अनुसार, राक्षसी महिषी का वध करने के बाद भगवान अयप्पा ने संसारिक सुखों का त्याग कर ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किया और वन में कठोर तपस्या में लीन हो गए। इसी कारण सबरीमाला मंदिर का ब्रह्मचर्य पालन से गहरा संबंध है।

परंपरागत रूप से 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध रहा, जिसे भगवान अयप्पा के ब्रह्मचारी स्वरूप से जोड़ा जाता था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात सभी आयु वर्ग की महिलाओं को भी मंदिर में प्रवेश और दर्शन का अधिकार प्राप्त हुआ।

कठिन यात्रा और सामूहिक भक्ति
सबरीमाला यात्रा शारीरिक और मानसिक तपस्या का अद्वितीय संगम है। तीर्थयात्री कठिन पर्वतीय मार्ग से होकर मंदिर तक पहुंचते हैं। यह यात्रा केवल पैरों की शक्ति नहीं, बल्कि धैर्य, श्रद्धा और विश्वास की भी परीक्षा है। भक्त “स्वामीये शरणम् अयप्पा” का उद्घोष करते हुए समूह में आगे बढ़ते हैं, जिससे सामूहिक भक्ति का दिव्य वातावरण निर्मित होता है।

18 पवित्र सीढ़ियों का आध्यात्मिक अर्थ
मंदिर की 18 पवित्र सीढ़ियां अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इनका संबंध पाँच कर्मेंद्रियों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों, तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम), चार वेदों और एक आत्मबोध से जोड़ा जाता है। इन सीढ़ियों को पार करना प्रतीकात्मक रूप से इंद्रियों और प्रकृति के गुणों पर विजय प्राप्त कर आत्मज्ञान की ओर बढ़ना माना जाता है।

मकरविलक्कु: दिव्य ज्योति का उत्सव
मकर संक्रांति के अवसर पर सबरीमाला में “मकरविलक्कु” उत्सव मनाया जाता है। पर्वत पर प्रज्वलित होने वाली रहस्यमयी ज्योति के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। भक्त इसे भगवान अयप्पा की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं। इस अवसर पर विशेष पूजा और भव्य आयोजन पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना देते हैं।

सबरीमाला केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि तप, संयम, अनुशासन और आस्था की पराकाष्ठा है। यह तीर्थ हमें सिखाता है कि आत्मसंयम, श्रद्धा और समर्पण के माध्यम से ही सच्ची आध्यात्मिक उन्नति संभव है। भगवान अयप्पा की साधना हमें भीतर की यात्रा करने और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देती है। “स्वामीये शरणम् अयप्पा” यही मंत्र भक्त को ईश्वर की शरण में ले जाकर उसे आध्यात्मिक शांति और आत्मबल प्रदान करता है।

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