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दिव्य सुधा > अन्य > सूर्य देव को जल चढ़ाने के नियम, सावधानियां और अद्भुत लाभ
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सूर्य देव को जल चढ़ाने के नियम, सावधानियां और अद्भुत लाभ

दिव्यसुधा
Last updated: November 30, 2025 11:53 am
दिव्यसुधा
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सूर्योदय के समय सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल चढ़ाते हुए व्यक्ति – सूर्य को जल चढ़ाने के नियम
सूर्योदय के समय सूर्य देव को तांबे के लोटे से अर्घ्य अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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सूर्य देव को जल चढ़ाने की परंपरा हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है बल्कि स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा से भी गहरा संबंध रखती है। सुबह सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देना जीवन में शुभ फल और दिव्य ऊर्जा प्रदान करता है।

सूर्य देव को जल चढ़ाने का सही तरीका
सूर्य देव को जल चढ़ाने से पहले स्नान करके स्वयं को शुद्ध करना आवश्यक है। शारीरिक और मानसिक पवित्रता से किया गया पूजन अधिक प्रभावशाली माना जाता है। स्नान के बाद साफ और हल्के वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों। सूर्योदय का समय जल अर्पण के लिए सबसे शुभ माना जाता है। जैसे ही सूर्य की पहली किरणें दिखाई दें, तांबे या चीनी के बर्तन में शुद्ध जल भरकर उसमें थोड़ा सा लाल चंदन, कुमकुम या रोली मिलाएँ। इस जल को सूर्य की ओर उठाकर एक निरंतर धारा के रूप में अर्पित करें। कोशिश करें कि जल की धारा बीच में टूटे नहीं। अर्घ्य देते समय मन को शांत रखकर “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ आदित्याय नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए। यह मंत्र सूर्य देव की कृपा आकर्षित करते हैं और पूजा को सिद्ध बनाते हैं।

  • जल चढ़ाते समय पालन करने योग्य नियम
  • सूर्य की दिशा पूर्व मानी जाती है, इसलिए अर्घ्य हमेशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके ही दिया जाना चाहिए। पूजा के दौरान शरीर और मन दोनों की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अशुद्ध अवस्था में अर्पित जल से अपेक्षित फल प्राप्त नहीं होता।
  • सूर्य देव को जल अर्पित करने के लिए धातु के पात्र का प्रयोग अत्यंत शुभ माना गया है। तांबे, चीनी या चाँदी के पात्र का उपयोग करना श्रेष्ठ है। यह शरीर और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाता है।
  • सूर्योदय से लेकर कुछ समय तक जल अर्पित किया जा सकता है, लेकिन सूर्यास्त या रात के समय ऐसा करना प्रतिबंधित माना गया है। सूर्य देव का पूजन केवल दिन के समय ही किया जाना चाहिए।

इन गलतियों से हमेशा बचें
जल अर्पित करते समय सबसे बड़ी भूल है सूर्य की ओर पीठ करना। यह अनादर माना जाता है और पूजा का फल कम कर देता है। प्लास्टिक के बर्तन से जल चढ़ाना भी वर्जित माना गया है, क्योंकि प्लास्टिक अपवित्र माना जाता है और पूजा में सकारात्मक कंपन उत्पन्न नहीं करता। पूजा के समय मन शांत और स्थिर होना चाहिए। क्रोध, तनाव या अशुद्ध विचारों के साथ पूजा करने से लाभ नहीं मिलता। जल का अपव्यय भी अनुचित माना गया है। जितना जल आवश्यक हो, उतना ही उपयोग करें।

सूर्य को जल चढ़ाने के दिव्य लाभ
सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और स्वास्थ्य में सुधार आता है। यह प्राणशक्ति बढ़ाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। मानसिक शांति भी इस प्रक्रिया का एक बड़ा लाभ है। नियमित अर्घ्य से मन शांत होता है, तनाव कम होता है और सकारात्मकता बढ़ती है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह कमजोर हो या सूर्य दोष हो, तो सूर्य देव की पूजा अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होती है। इससे आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और सम्मान तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। सूर्य देव को जल चढ़ाना आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी माना गया है। यह साधना मन को शुद्ध करती है और व्यक्ति के अंदर दिव्यता का विकास करती है।

सूर्य देव को जल चढ़ाना एक सरल, सहज और अत्यंत प्रभावशाली आध्यात्मिक प्रक्रिया है। यदि सही नियमों का पालन किया जाए और मन को पूर्ण श्रद्धा से जोड़ा जाए, तो यह साधना जीवन में दिव्य ऊर्जा, स्वास्थ्य, समृद्धि और मानसिक शांति प्रदान करती है। प्रतिदिन या सप्ताह में कम से कम एक बार सूर्य को अर्घ्य देकर आप अपने जीवन में अद्भुत सकारात्मक बदलाव महसूस कर सकते हैं।

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