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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > रत्नेश्वर मंदिर – इतिहास, रहस्य और आस्था की अद्भुत कहानी
मंदिर

रत्नेश्वर मंदिर – इतिहास, रहस्य और आस्था की अद्भुत कहानी

दिव्यसुधा
Last updated: February 15, 2026 3:32 pm
दिव्यसुधा
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वाराणसी के मणिकर्णिका घाट के पास गंगा किनारे झुका हुआ रत्नेश्वर महादेव मंदिर
गंगा तट पर स्थित झुका हुआ रत्नेश्वर महादेव मंदिर, जिसे “काशी करवट” के नाम से भी जाना जाता है।
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उत्तर प्रदेश के पवित्र शहर वाराणसी में स्थित रत्नेश्वर महादेव मंदिर भारत के सबसे अनोखे शिव मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर अपनी अद्भुत बनावट और झुकी हुई संरचना के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इसे “काशी करवट” भी कहा जाता है, क्योंकि यह मंदिर एक ओर झुका हुआ दिखाई देता है। यह मंदिर गंगा किनारे मणिकर्णिका घाट के पास स्थित है और धार्मिक तथा ऐतिहासिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

 मंदिर का इतिहास

इस मंदिर के निर्माण को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर राजा मानसिंह के सेवक ने अपनी मां रत्ना बाई की याद में बनवाया था। वहीं कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इसे मराठा काल या 19वीं सदी में बनवाया गया। स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण कम होने के कारण इसकी सही निर्माण तिथि तय नहीं हो पाई है। कुछ पुराने चित्र और दस्तावेज बताते हैं कि 19वीं सदी में यह मंदिर सीधा खड़ा था, लेकिन समय के साथ यह झुकने लगा। वर्तमान में यह लगभग 9 डिग्री झुका हुआ माना जाता है, जो दुनिया के कई झुके स्मारकों से भी ज्यादा है।

 मंदिर के झुकने का वैज्ञानिक कारण

वैज्ञानिक और वास्तु विशेषज्ञ मानते हैं कि मंदिर के झुकने का मुख्य कारण इसकी कमजोर नींव और गंगा नदी के किनारे की मिट्टी है। यह क्षेत्र सिल्ट और रेतीली मिट्टी से बना है, जो समय के साथ धंस सकती है।

 धार्मिक रहस्य और लोककथा

इस मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा “मातृ ऋण” की है। कहा जाता है कि मंदिर बनाने वाले व्यक्ति ने कहा कि उसने अपनी मां का कर्ज चुका दिया। इस पर उसकी मां ने कहा कि मां का ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता और मंदिर को श्राप दे दिया। इसके बाद मंदिर झुक गया। यह कहानी आस्था और संस्कार का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें बताया गया है कि माता-पिता का ऋण जीवनभर रहता है।

 पानी में डूबा रहने वाला मंदिर

इस मंदिर की एक खास बात यह भी है कि यह साल के कई महीनों तक गंगा के पानी में डूबा रहता है। बारिश और बाढ़ के समय मंदिर का गर्भगृह पूरी तरह पानी में चला जाता है। कई बार पुजारी पानी में उतरकर पूजा करते थे। यह दृश्य इस मंदिर को और भी रहस्यमयी बनाता है। 2016 में इस मंदिर पर बिजली गिरने की घटना भी हुई थी, जिससे मंदिर के शिखर को नुकसान पहुंचा था। हालांकि मंदिर की संरचना फिर भी मजबूत बनी रही। भले ही मंदिर झुका हुआ है और पानी में डूब जाता है, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था आज भी अटूट है। महाशिवरात्रि पर यहां विशेष है पूजा होती कई भक्त इसे चमत्कारी और शक्ति से भरा मंदिर मानते हैं, यह काशी की आध्यात्मिक पहचान का हिस्सा है।

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