फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पावन रंगभरी एकादशी, जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है, सनातन धर्म में अत्यंत शुभ और फलदायी मानी गई है। यह तिथि भगवान विष्णु की उपासना को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यता है कि जो साधक श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ इस व्रत का पालन करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति, मानसिक शांति तथा जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में वर्णित है कि एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण किया जाए। इसलिए व्रत के साथ पारण के समय और विधि का विशेष महत्व है।
तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में रंगभरी एकादशी का व्रत 27 फरवरी को रखा जाएगा। एकादशी तिथि का प्रारंभ 27 फरवरी को रात्रि 12 बजकर 33 मिनट पर होगा और इसका समापन उसी दिन रात्रि 10 बजकर 32 मिनट पर होगा। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान विष्णु का पूजन, मंत्रजप और भजन-कीर्तन करते हैं।
व्रत पारण का समय
द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करना आवश्यक माना गया है। वर्ष 2026 में पारण 28 फरवरी को किया जाएगा। पारण का शुभ समय प्रातः 06:47 से 09:06 बजे तक रहेगा। इसके अतिरिक्त ब्रह्म मुहूर्त 05:08 से 05:58 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त 12:11 से 12:57 बजे तक, विजय मुहूर्त 02:29 से 03:15 बजे तक तथा गोधूलि मुहूर्त 06:18 से 06:58 बजे तक रहेगा। यद्यपि पारण प्रातःकाल करना अधिक श्रेष्ठ माना गया है।
व्रत पारण विधि
द्वादशी के दिन प्रातः शीघ्र उठकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। पूजा स्थल की स्वच्छता का ध्यान रखें। इसके पश्चात भगवान विष्णु को फल, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। देसी घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें तथा परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। सात्विक भोजन का भोग लगाकर चरणामृत और तुलसी पत्र ग्रहण करते हुए व्रत का पारण करें।
मान्यता है कि इस दिन अन्न, धन, वस्त्र आदि का दान करने से व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। श्रद्धा और संयम के साथ किया गया यह व्रत साधक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिक उन्नति और मंगलमय परिणाम प्रदान करता है।