पुष्कर की पवित्र धरती पर स्थित नया रंगजी मंदिर में भगवान बैकुंठ के ब्रह्मोत्सव के अवसर पर भव्य और श्रद्धा से परिपूर्ण सवारी निकाली गई। इस पावन आयोजन ने पूरे नगर को भक्तिमय वातावरण में सराबोर कर दिया। मंदिर परिसर को आकर्षक फूलों, रंग-बिरंगी रोशनी और पारंपरिक सजावट से सुसज्जित किया गया था, जिससे हर ओर आध्यात्मिक उत्सव का अद्भुत दृश्य दिखाई दे रहा था। मंदिर के मुख्य द्वार से लेकर आसपास की गलियों तक श्रद्धालुओं की भीड़ और भक्ति का उल्लास साफ झलक रहा था।
ब्रह्मोत्सव के इस विशेष अवसर पर भगवान रंगजी की प्रतिमा को सुंदर वस्त्रों और आकर्षक आभूषणों से अलंकृत किया गया। इसके बाद भगवान को एक विशेष रूप से सुसज्जित रथ में विराजमान कर नगर भ्रमण के लिए निकाला गया। सवारी मंदिर परिसर से आरंभ होकर पुष्कर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए पुनः मंदिर परिसर में वापस पहुंची। इस दौरान मार्ग के दोनों ओर खड़े श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा कर भगवान का स्वागत किया और भक्ति भाव से जयकारे लगाए।
सवारी के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय दिखाई दे रहा था। बैंड-बाजों, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज से पूरा नगर उत्सव में डूबा हुआ नजर आया। महिलाएं पारंपरिक मंगल गीत गा रही थीं, जबकि पुरुष श्रद्धालु “जय श्री रंगजी” और “गोविंद जय जय” के जयकारे लगाते हुए भगवान की सवारी के साथ चल रहे थे। धार्मिक संगीत और भक्ति भाव से भरे इस माहौल ने उपस्थित सभी भक्तों को आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कराया।
मंदिर के पुजारियों और वैदिक आचार्यों द्वारा भगवान बैकुंठ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इस अवसर पर विशेष आरती और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न हुए, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त किया। भक्तों का विश्वास है कि ब्रह्मोत्सव के इस पावन अवसर पर भगवान के दर्शन करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
इस भव्य आयोजन में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ दूर-दराज से आए भक्तों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। पुष्कर की पवित्र भूमि पर आयोजित यह धार्मिक उत्सव न केवल आस्था का प्रतीक बना, बल्कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव भी बन गया। भगवान बैकुंठ के ब्रह्मोत्सव की यह दिव्य सवारी भक्तों के मन में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करती रही।