हर वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाने वाला पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) उन दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का विशेष अवसर होता है, जिन्होंने जीवन के मार्ग को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत के विभिन्न तीर्थस्थलों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक क्रियाएं होती हैं, लेकिन तीर्थराज प्रयागराज का महत्व इस कालखंड में सर्वोपरि माना गया है।
त्रिवेणी संगम: पुण्य की अक्षय धारा
प्रयागराज स्थित त्रिवेणी संगम – जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का मिलन होता है – को अक्षय क्षेत्र कहा जाता है। ‘अक्षय’ का अर्थ है – जो कभी समाप्त न हो। मान्यता है कि इस संगम स्थल पर किया गया दान, पुण्य, स्नान और श्राद्ध कर्म जन्म-जन्मान्तरों तक संचित रहता है और आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। श्रद्धालु पितरों की मुक्ति हेतु पवित्र त्रिवेणी में पितरों के नाम की डुबकी लगाते हैं, ताकि उनके पूर्वजों को दिव्य गति प्राप्त हो सके। यह डुबकी केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भावनाओं का समर्पण है।
तीर्थराज प्रयागराज पितृ उद्धार का केंद्र
जहां भारत के अन्य तीर्थ स्नान और दान से व्यक्ति के पापों को हरते हैं, वहीं प्रयागराज का संगम क्षेत्र न केवल व्यक्ति को पुण्य प्रदान करता है, बल्कि उनके पितरों को भी मोक्ष प्रदान करता है। यह क्षेत्र पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वर्ग की सीढ़ी** कहा गया है, जहां श्रद्धापूर्वक किया गया पिण्डदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म पितरों को सीधा पुण्य फल प्रदान करता है।
पितृ पक्ष में संगम स्नान का विशेष फल
पितृपक्ष में गंगा और यमुना की निर्मल धाराएं उन पितरों तक पुण्य पहुंचाती हैं, जिनके लिए संतान यहां श्राद्ध कर्म करती है। श्राद्ध कर्म, पिण्डदान और तर्पण के माध्यम से संतति द्वारा अर्जित पुण्य उन पितरों को प्रदान होता है, जिनकी आत्मा अभी भी शांति की तलाश में है। यह माना जाता है कि यदि संतान संगम में पितरों के नाम पर स्नान करके, श्रद्धापूर्वक तर्पण करती है, तो उनके पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका पुनर्जन्म चक्र समाप्त हो सकता है।
तीर्थ की परिभाषा और प्रयागराज की विशेषता
भारतीय वांग्मय के अनुसार, ‘तीर्थ’ वह स्थल होता है जहां पवित्रता का संचार, पापों का नाश, पुण्य का संचय और मोक्ष की प्राप्ति संभव हो। प्रयागराज का संगम क्षेत्र इन सभी मान्यताओं पर खरा उतरता है। इसलिए इसे तीर्थों का राजा कहा गया है। यह वह स्थान है, जहां केवल एक स्नान या दान से नहीं, बल्कि भावनाओं, आस्था और पवित्र उद्देश्य से किया गया हर कर्म अक्षय पुण्य में परिवर्तित हो जाता है।
वर्तमान समय में भी कायम है आस्था
आज के आधुनिक युग में भी, पितृपक्ष के दौरान प्रयागराज की ओर श्रद्धालुओं का अपार सैलाब उमड़ता है। देश के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं – सिर्फ एक स्नान या कर्मकांड के लिए नहीं, बल्कि अपने पुरखों से जुड़ने, उन्हें सम्मान और शांति देने और अपने जीवन में आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करने के लिए।
एक आध्यात्मिक उत्तरदायित्व
पितृ पक्ष केवल एक कर्मकांड नहीं, यह एक आध्यात्मिक उत्तरदायित्व है – अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का समय। तीर्थराज प्रयागराज का त्रिवेणी संगम इस अवसर पर एक ऐसा केंद्र बन जाता है, जहां श्रद्धा, परंपरा और मोक्ष तीनों का मिलन होता है। इस पितृपक्ष 2025 में भी, जब श्रद्धालु संगम में पितरों के नाम की डुबकी लगाएंगे, तो वह केवल जल में ही नहीं उतरेंगे बल्कि वे धर्म, परंपरा और आत्मिक संबंधों की गहराइयों में उतरेंगे।