प्राचीन काल में एक महान तपस्वी ऋषि थे — शिलाद। वे अत्यंत विद्वान और धर्मनिष्ठ थे, पर उनके जीवन में एक ही अभिलाषा थी — ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो मृत्यु से परे हो, जो साधारण मानव की सीमाओं में बंधा न हो। वे जानते थे कि यह वरदान साधारण तप से नहीं मिलेगा। अतः उन्होंने संकल्प लिया और घोर तपस्या में लीन हो गए।
वर्षों बीत गए। ऋषि शिलाद का शरीर कृश हो गया, पर उनका संकल्प अटल रहा। अंततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिव प्रकट हुए। आकाश गूँज उठा, वातावरण दिव्य प्रकाश से भर गया। शिव ने कहा, “हे शिलाद, तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हें एक अद्भुत पुत्र प्राप्त होगा।”
ऋषि ने यज्ञ किया। अग्नि की ज्वालाओं से एक तेजस्वी बालक प्रकट हुआ — वह था नंदी। उसका मुख शांत था, नेत्रों में गहन ज्ञान की चमक थी। शिलाद का हृदय आनंद से भर उठा। उन्हें लगा, उनकी तपस्या सफल हुई।
बालक नंदी आश्रम में बड़ा होने लगा। वह अत्यंत बुद्धिमान, विनम्र और तेजस्वी था। उसकी उपस्थिति से आश्रम में अद्भुत शांति रहती। एक दिन दो महर्षि आश्रम पधारे। उन्होंने नंदी को देखा, उसके तेज को परखा, और गंभीर स्वर में बोले, “यह बालक दिव्य है, पर इसकी आयु अत्यंत अल्प है।”
नंदी का संकल्प
ये शब्द सरल थे, पर उनके अर्थ वज्र के समान भारी। शिलाद का हृदय काँप उठा। जिस पुत्र को उन्होंने मृत्यु से परे माँगा था, वही अल्पायु कैसे हो सकता है? वे व्याकुल हो गए, उनका मन भय से भर गया।
परंतु नंदी शांत रहे। उनके मुख पर न चिंता थी, न भय। उन्होंने पिता से कहा, “पिताश्री, यदि आयु सीमित है तो मैं उसे तप से असीम बना दूँगा। यदि भाग्य लिखा है, तो मैं भक्ति से उसे बदल दूँगा।” इतना कहकर वे वन की ओर चले गए।
नंदी ने कठोर तपस्या आरंभ की। वे अचल खड़े रहे, कभी एक पाँव पर, कभी जल में खड़े होकर, कभी निराहार। न कोई शिकायत, न कोई प्रश्न — केवल एक ही नाम उनके हृदय में था — शिव। उनका मन पूर्ण समर्पण से भर गया। उनका अस्तित्व भक्ति में विलीन हो गया।
दीर्घ काल के पश्चात् फिर से दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। शिव स्वयं वहाँ प्रकट हुए, साथ में माता पार्वती भी थीं। शिव ने स्नेह से नंदी को उठाया और कहा, “वत्स, तुम्हारी भक्ति ने मृत्यु को भी जीत लिया है। अब तुम मेरे अंश हो। तुम सदा मेरे साथ रहोगे।”
शिव ने नंदी को वाहन और द्वारपाल का पद दिया
उसी क्षण नंदी का स्वरूप दिव्य हो उठा। वे वृषभ रूप में परिवर्तित हुए — बल, धैर्य और धर्म के प्रतीक। शिव ने उन्हें अपने वाहन और द्वारपाल का पद दिया। केवल वाहन ही नहीं, वे शिव के परम गणों के प्रधान बने, उनके सबसे निकटतम भक्त।
तभी से नंदी सदैव शिव के सम्मुख विराजमान रहते हैं। चाहे मंदिर हो या कैलास, वे अडिग बैठकर अपने प्रभु का ध्यान करते हैं। भक्त जब शिवलिंग के दर्शन करते हैं, तो पहले नंदी के कान में अपनी प्रार्थना कहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं — नंदी सच्चे भक्त हैं, और सच्चे भक्त के माध्यम से की गई प्रार्थना सीधे भगवान तक पहुँचती है।
यह कथा हमें स्मरण कराती है —
जहाँ भक्ति अचल हो, वहाँ भाग्य भी बदल जाता है।
जहाँ विश्वास अडिग हो, वहाँ मृत्यु भी पराजित हो जाती है।
और जहाँ समर्पण पूर्ण हो, वहाँ भगवान स्वयं दूर नहीं रहते।