मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायिका तिथि माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस एकादशी का व्रत रखने से जन्म–जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान दिया था, जिसके कारण इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है। मोक्षदा एकादशी का व्रत व्यक्ति को पवित्र बनाता है और पितरों को भी मुक्ति प्रदान करता है।
मोक्षदा एकादशी व्रत का पौराणिक महत्व
इस एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय माना गया है। मान्यता है कि इस दिन किए गए उपवास, पूजा और दान से न केवल मनुष्य के पाप कटते हैं, बल्कि उसके पितरों को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस तिथि पर व्रत रखकर लोग अपने पूर्वजों के कल्याण की कामना करते हैं। यह दिन मन को सत्त्वगुण से भर देता है और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
मोक्षदा एकादशी 2025 तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, मोक्षदा एकादशी तिथि की शुरुआत 30 नवंबर 2025 को रात 9 बजकर 29 मिनट से हो रही है। यह तिथि 1 दिसंबर 2025 को रात 7 बजकर 01 मिनट पर समाप्त होगी। इसी अवधि में व्रत रखा जाएगा और श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की पूजा की जाएगी।
मोक्षदा एकादशी व्रत पारण समय 2025
व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर किया जाता है। वर्ष 2025 में पारण 2 दिसंबर को होगा। पारण का शुभ समय सुबह 6 बजकर 51 मिनट से लेकर 9 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। इस समय अवधि में व्रत समाप्त करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
मोक्षदा एकादशी व्रत पारण का महत्व
मोक्षदा एकादशी का व्रत जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही इसका पारण भी आवश्यक माना गया है। पारण का अर्थ है व्रत को विधिवत समाप्त करना। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि सही विधि से पारण न किया जाए, तो व्रत का फल अधूरा रह जाता है। इसलिए द्वादशी तिथि में शुभ समय पर पारण करना अनिवार्य बताया गया है। माना जाता है कि नियमपूर्वक पारण करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और भक्त को मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होती है।
मोक्षदा एकादशी व्रत पारण विधि
द्वादशी के दिन सुबह स्नान कर शरीर और मन को शुद्ध किया जाता है। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर दिन की शुरुआत की जाती है। तत्पश्चात भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा की जाती है और मंत्र जप के साथ जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है। पारण के समय भगवान को सात्विक भोजन का भोग लगाया जाता है, जिसमें तुलसी अवश्य शामिल हो। भोग के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है और ब्राह्मणों या गरीब लोगों को भोजन, कपड़े और धन का दान दिया जाता है। दान को इस व्रत का सर्वोच्च फलदायी अंग माना गया है।