इस संसार में हर व्यक्ति किसी न किसी लक्ष्य की ओर दौड़ रहा है—धन, प्रतिष्ठा, रिश्ते, सफलता और सुख की तलाश में। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है। क्षणिक खुशी मिलती है, फिर मन में खालीपन घिर आता है। यह अंतहीन दौड़ क्यों चलती रहती है? आध्यात्मिक दृष्टि से इस पूरे खेल को “माया” कहा गया है। हमारे शास्त्र, विशेषकर उपनिषद, बताते हैं कि माया वह शक्ति है जो हमें अस्थायी को स्थायी समझने का भ्रम देती है। यह हमें बाहरी जगत की चमक में उलझाकर हमारे वास्तविक स्वरूप से दूर कर देती है।
माया क्या है?
माया का सरल अर्थ है—भ्रम। जो वस्तु हमें वास्तविक और स्थायी प्रतीत होती है, परंतु समय के साथ बदल जाती है या समाप्त हो जाती है, वही माया है।
- पैसा—आज है, कल नहीं।
- सुंदरता—समय के साथ क्षीण हो जाती है।
- रिश्ते—परिस्थितियों और भावनाओं पर निर्भर होते हैं।
फिर भी हम इन्हीं को अपनी खुशी का आधार बना लेते हैं। माया हमें यह विश्वास दिलाती है कि यदि ये सब मिल जाएँ तो जीवन पूर्ण और स्थायी रूप से सुखी हो जाएगा। परंतु सत्य यह है कि जो वस्तु स्वयं अस्थायी है, उससे मिलने वाला सुख भी अस्थायी ही होगा। यही कारण है कि संतुष्टि क्षणिक रहती है और मन फिर किसी नई चाह में भटकने लगता है।
माया में फँसने का कारण
इंसान माया में इसलिए उलझता है क्योंकि वह अपनी असली पहचान से अनजान रहता है। जब हम यह भूल जाते हैं कि हम केवल शरीर या मन नहीं,बल्कि चेतना हैं, तब हम अपनी पहचान बाहरी उपलब्धियों में ढूँढ़ने लगते हैं। यही अज्ञान हमें बाँधता है।
संत कबीर ने कहा था—
“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।”
अर्थात शरीर तो नश्वर है, पर मन की इच्छाएँ और आकर्षण समाप्त नहीं होते। यही इच्छाएँ हमें जन्म-मृत्यु के चक्र में बाँधे रखती हैं। जब तक मन शांत नहीं होता, तब तक माया का प्रभाव बना रहता है।
सुख और दुख का खेल
माया का सबसे बड़ा जाल है—सुख और दुख का चक्र। जब हमें मनचाही वस्तु मिलती है, हम प्रसन्न हो जाते हैं। वही वस्तु छिन जाए तो दुखी हो जाते हैं। यदि खुशी वास्तव में बाहरी वस्तुओं पर निर्भर होती, तो वह स्थायी क्यों नहीं रहती?
सच्चाई यह है कि बाहरी वस्तुएँ केवल मन को थोड़े समय के लिए उत्तेजित करती हैं। वास्तविक शांति और आनंद भीतर से उत्पन्न होते हैं। जब तक हम आनंद का स्रोत बाहर खोजते रहेंगे, तब तक असंतोष बना रहेगा। जैसे समुद्र की लहरें कभी स्थिर नहीं होतीं, वैसे ही बाहरी परिस्थितियाँ भी बदलती रहती हैं। जो व्यक्ति इन उतार-चढ़ावों से ऊपर उठ जाता है, वही स्थिर सुख का अनुभव करता है।
माया से बाहर निकलने का मार्ग
माया से पूर्ण मुक्ति कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं। इसके लिए जागरूकता और अभ्यास आवश्यक है।
1. आत्म-चिंतन
प्रतिदिन स्वयं से पूछें—मैं कौन हूँ? मेरा जीवन उद्देश्य क्या है?” यह प्रश्न हमें भीतर की ओर ले जाते हैं और बाहरी आकर्षण का प्रभाव कम करते हैं।
2. ध्यान और साधना
ध्यान मन को शांत करता है और वर्तमान क्षण में स्थिर रहने की शक्ति देता है। जब मन शांत होता है, तो इच्छाओं की तीव्रता घटती है और माया का प्रभाव कम होने लगता है।
3. संतुलित जीवन
माया से भागना समाधान नहीं है। संसार में रहते हुए संतुलन बनाए रखना ही सच्ची साधना है। काम करें, पर उसमें खो न जाएँ। रिश्ते निभाएँ, पर उनसे अपनी पहचान न जोड़ें। यह दृष्टिकोण हमें आंतरिक स्वतंत्रता देता है।
4. ज्ञान का अध्ययन
आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन अत्यंत सहायक है। भगवद गीता में कृष्ण ने अर्जुन को समझाया—“कर्म करो, पर फल की चिंता मत करो।” यह शिक्षा बताती है कि जब हम परिणाम के मोह से मुक्त होकर कर्तव्य निभाते हैं, तब मन शांति का अनुभव करता है।
माया और मन का संबंध
माया बाहर नहीं, हमारे मन में है। मन ही इच्छाएँ उत्पन्न करता है और वही हमें बाँधता है। यदि मन पर नियंत्रण हो जाए, तो माया का प्रभाव स्वतः कम हो जाता है। इसलिए कहा गया है—“मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।”
जब मन स्थिर होता है, तब व्यक्ति परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। वह जानता है कि सुख और दुख दोनों अस्थायी हैं। यह समझ ही आंतरिक स्वतंत्रता की शुरुआत है।
क्या माया से पूर्ण मुक्ति संभव है?
हाँ, संभव है—पर इसके लिए निरंतर अभ्यास, धैर्य और समर्पण चाहिए। जब व्यक्ति अपने भीतर स्थिर हो जाता है, तब उसे बाहरी वस्तुओं पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती। वह हर परिस्थिति में शांत रहता है—सुख में भी, दुख में भी। यही अवस्था मोक्ष या आत्मबोध कहलाती है।
सच्ची आध्यात्मिकता क्या है?
आध्यात्मिकता का अर्थ संसार त्यागना नहीं, बल्कि आसक्ति त्यागना है। सच्ची आध्यात्मिकता यह है कि हम इस दुनिया में रहकर भी उससे बँधे न रहें। कार्य करें, पर अहंकार न बढ़ाएँ। प्रेम करें, पर स्वामित्व की भावना न रखें। जब जीवन संतुलित होता है, तब भीतर शांति माया कोई शत्रु नहीं, बल्कि एक परीक्षा है। यह हमें सिखाती है कि क्या स्थायी है और क्या क्षणभंगुर। जब हम माया को समझ लेते हैं, तब हम उसके जाल में फँसते नहीं, बल्कि जागरूक होकर जीवन जीते हैं। अंततः जो व्यक्ति स्वयं को जान लेता है, उसके लिए माया का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। वह इस संसार में रहते हुए भी मुक्त रहता है। वही सच्ची स्वतंत्रता है, वही सच्चा आनंद।