प्रयागराज की पावन भूमि पर आयोजित माघ मेला और मौनी अमावस्या का महास्नान सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी पावन अवसर पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा एक विवाद चर्चा का विषय बन गया, जिसने श्रद्धालुओं और संत समाज का ध्यान आकर्षित किया है।
मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने अनुयायियों के साथ संगम स्नान के लिए पालकी पर सवार होकर पहुंचे थे। संगम नोज क्षेत्र में भारी भीड़ और सुरक्षा व्यवस्था के चलते पुलिस प्रशासन द्वारा बैरिकेडिंग की गई थी। इसी दौरान प्रशासन ने पालकी को आगे बढ़ने से रोक दिया और शंकराचार्य से पैदल स्नान करने का अनुरोध किया गया।
पालकी रोके जाने पर उत्पन्न हुआ विवाद
इस निर्णय से शंकराचार्य और उनके अनुयायी असहमत दिखाई दिए। उनका कहना था कि वे वर्षों से इसी परंपरा के अनुसार संगम स्नान करते आ रहे हैं और पालकी का उद्देश्य श्रद्धालुओं की सुरक्षा व भगदड़ से बचाव भी है। पालकी रोके जाने के बाद मौके पर तनाव की स्थिति बन गई और काफी देर तक पुलिस व अनुयायियों के बीच बहस और धक्का-मुक्की की खबरें सामने आईं। अंततः शंकराचार्य बिना संगम स्नान किए वापस लौट गए।
धरना और मौन व्रत
इस घटना से आहत शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर के बाहर धरना प्रारंभ कर दिया। सूर्यास्त के पश्चात उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया। यह भी बताया गया कि उन्होंने अन्न-जल का त्याग किया है। शंकराचार्य का कहना है कि यह केवल उनके सम्मान का नहीं, बल्कि संत परंपरा और सनातन मर्यादा का प्रश्न है।
शंकराचार्य का पक्ष
शंकराचार्य ने कहा कि पालकी पर स्नान की व्यवस्था इसलिए होती है ताकि दर्शन के लिए उमड़ने वाली भीड़ से अव्यवस्था न फैले। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें पैदल करने का आग्रह कर अपमानित किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक संबंधित अधिकारी ससम्मान उन्हें संगम स्नान के लिए नहीं ले जाएंगे, तब तक वे स्नान नहीं करेंगे।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
प्रयागराज पुलिस प्रशासन का कहना है कि मौनी अमावस्या पर अत्यधिक भीड़ को देखते हुए सुरक्षा कारणों से यह निर्णय लिया गया। पुलिस कमिश्नर के अनुसार, शंकराचार्य से सीमित अनुयायियों के साथ पैदल स्नान का अनुरोध किया गया था, लेकिन सहमति नहीं बन पाई। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि माघ मेले में नई परंपराएं लागू करने की अनुमति नहीं है।
आस्था और व्यवस्था के बीच संतुलन
यह घटना एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा करती है कि विशाल धार्मिक आयोजनों में आस्था, परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। संगम स्नान केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा विषय है। ऐसे में संवाद, सम्मान और संयम के साथ समाधान निकलना ही सनातन परंपरा की सच्ची भावना को दर्शाता है।