मौनी अमावस्या सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन और आध्यात्मिक पर्व है, जिसका मूल आधार मौन व्रत माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मौन धारण कर स्नान, ध्यान, जप और पूजा करने से मन की चंचलता शांत होती है और आत्मा निर्मल होती है। मौन केवल वाणी को रोकना नहीं, बल्कि मन और विचारों को भी संयमित करने की साधना है। इसी कारण इस अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा गया है।
माघी अमावस्या और पुण्य परंपरा
माघ मास की अमावस्या को धार्मिक रूप से माघी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान और पुण्य कर्म करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि इस दिन मौन रहकर की गई पूजा-अर्चना साधक को विशेष आध्यात्मिक फल प्रदान करती है और उसे बाहरी शोर से हटाकर भीतर की शांति से जोड़ती है।
रविवार का विशेष संयोग
इस वर्ष मौनी अमावस्या रविवार को पड़ रही है, जिससे इसका महत्व और अधिक बढ़ गया है। रविवार सूर्य देव को समर्पित होता है और सूर्य को आत्मबल, तेज, चेतना और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है। रविवार और मौनी अमावस्या का यह संयोग इस पर्व को अत्यंत फलदायी बनाता है।
तिथि, योग और शुभ नक्षत्र
पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 17 जनवरी की रात 12 बजकर 05 मिनट से शुरू होकर 18 जनवरी की रात 1 बजकर 22 मिनट तक रहेगी। सूर्योदय के समय अमावस्या होने के कारण पर्व 18 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, हर्षण योग और शिव वास योग का शुभ संयोग रहेगा। साथ ही पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र स्नान, दान और साधना को विशेष फलदायी बनाते हैं।
पवित्र स्नान का महत्व
मौनी अमावस्या के दिन गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का क्षय और पुण्य की वृद्धि होती है। यदि नदी में स्नान संभव न हो, तो गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। स्नान से पूर्व मौन धारण कर सूर्य देव को अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना गया है।
दान और सेवा का पुण्य
इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, कंबल, तिल, दूध, तेल या धन का दान अक्षय पुण्य देता है। पशु-पक्षियों को भोजन कराने से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।
ब्रह्म मुहूर्त, उपवास और साधना
ब्रह्म मुहूर्त में स्नान, जप और ध्यान करने से साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। उपवास से इंद्रियों पर नियंत्रण आता है और मन शिव-तत्व में स्थिर होता है।
पितृ दोष निवारण का उपाय
इस दिन सूर्य को अर्घ्य देकर, ॐ आद्य-भूताय विद्महे… मंत्र का 108 बार जाप पितृ दोष निवारण में सहायक माना गया है।
मौनी अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मौन, साधना और आत्मिक जागरण का पर्व है, जो मनुष्य को भीतर के प्रकाश से जोड़ता है।