माघ मास की मौनी अमावस्या सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी तिथि मानी जाती है। इस वर्ष मौनी अमावस्या रविवार को पड़ रही है, जिससे इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। रविवार सूर्य देव को समर्पित होता है, जो आत्मबल, चेतना और ऊर्जा के प्रतीक हैं। ऐसे में सूर्यवार और मौनी अमावस्या का संयोग इस पर्व को विशेष फलदायी बना देता है।
शास्त्रों के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत, पवित्र नदियों में स्नान, दान, पूजा, ध्यान और मन की शुद्धि करने से व्यक्ति को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यह तिथि स्नान, दान और पितरों के तर्पण के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है। मान्यता है कि माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
मौनी अमावस्या व्रत के नियम और महत्व
मौनी अमावस्या के दिन मौन रहना केवल वाणी का संयम नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों पर नियंत्रण की साधना है। इस दिन किया गया दान शास्त्रों में अश्वमेध यज्ञ के समान फल देने वाला बताया गया है। तिल, गुड़, कंबल, ऊनी वस्त्र और अन्न का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन सभी पवित्र नदियों का जल अमृत के समान गुणकारी हो जाता है।
मौनी अमावस्या की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, कांचीपुरी नगर में देवस्वामी नामक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम धनवती था। उनके सात पुत्र और एक अत्यंत संस्कारी पुत्री थी, जिसका नाम गुणवती था। समय आने पर ब्राह्मण ने पुत्री के विवाह के लिए उसकी कुंडली एक विद्वान पंडित को दिखाई। कुंडली देखकर पंडित ने बताया कि विवाह के समय ही गुणवती के वैधव्य का अशुभ योग है। यह सुनकर ब्राह्मण अत्यंत चिंतित और व्याकुल हो गए।
जब ब्राह्मण ने इस दोष से मुक्ति का उपाय पूछा, तो पंडित ने बताया कि यदि गुणवती सोमा नामक धोबिन की सेवा कर उसकी शुद्धि अर्थात पुण्य प्राप्त कर ले, तो यह वैधव्य योग समाप्त हो सकता है। सोमा सिंहल द्वीप पर रहती थी और उसके पुण्य का प्रभाव अत्यंत शक्तिशाली माना जाता था। यह सुनकर ब्राह्मण का सबसे छोटा पुत्र अपनी बहन गुणवती को साथ लेकर सोमा की खोज में कठिन यात्रा पर निकल पड़ा।
इस यात्रा में उन्हें अनेक बाधाओं और कष्टों का सामना करना पड़ा, लेकिन ईश्वर की कृपा से वे अंततः सोमा के घर पहुँच गए। वहाँ गुणवती ने बिना किसी अपेक्षा के, पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता के साथ सोमा की सेवा शुरू कर दी। वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर घर की सफाई करती और चुपचाप लौट जाती। उसकी निस्वार्थ सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर सोमा ने अपनी शुद्धि, यानी पुण्य, गुणवती को देने का वचन दिया। विवाह के पश्चात जब नियति के अनुसार गुणवती के पति की मृत्यु हो गई, तब सोमा के पुण्यदान के प्रभाव से उसका पति पुनः जीवित हो उठा। यह कथा सेवा, श्रद्धा और पुण्य की अद्भुत शक्ति को दर्शाती है।
पीपल पूजन का चमत्कार
सोमा द्वारा पुण्यदान करने से उसके अपने परिवार पर संकट आ गया और उसके पति व पुत्रों की मृत्यु हो गई। दुखी होकर लौटते समय वह एक पीपल वृक्ष के पास रुकी। उस दिन माघ अमावस्या थी। उसने भगवान विष्णु का ध्यान कर पीपल की 108 परिक्रमा की। उसके व्रत और भक्ति के प्रभाव से उसके परिवार के सदस्य भी पुनः जीवित हो उठे।
मौनी अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, बल्कि संयम, सेवा, श्रद्धा और आत्मिक शुद्धि का पर्व है। यह दिन सिखाता है कि मौन, दान और भक्ति से असंभव भी संभव हो सकता है। मौन रहकर व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करता है, जो आध्यात्मिक उन्नति का मूल आधार है। यही कारण है कि मौनी अमावस्या को आत्मशुद्धि और मोक्ष की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया है।