पौराणिक परंपरा में माता सती की कथा अत्यंत मार्मिक और दिव्य मानी जाती है। यह कथा केवल एक पारिवारिक विवाद की कहानी नहीं, बल्कि शक्ति और शिव के सनातन संबंध की गहन आध्यात्मिक व्याख्या भी है। 51 शक्तिपीठों की स्थापना इसी करुण प्रसंग से जुड़ी हुई है।
माता सती, प्रजापति राजा दक्ष की पुत्री थीं। दक्ष ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माने जाते थे और अत्यंत प्रभावशाली तथा यज्ञप्रिय थे। सती बचपन से ही भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं। वे शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। कठोर तपस्या के बाद उनकी यह मनोकामना पूर्ण हुई और उनका विवाह शिव से संपन्न हुआ।
किन्तु दक्ष को यह विवाह स्वीकार नहीं था। वे शिव को एक विरक्त, भस्मधारी, श्मशानवासी योगी मानते थे, जो राजसी ठाठ-बाट से दूर रहते थे। दक्ष को यह बात खटकती थी कि उनकी पुत्री ने ऐसे तपस्वी को पति रूप में चुना, जो उनके मानकों के अनुसार योग्य नहीं था। इस कारण वे शिव के प्रति भीतर ही भीतर द्वेष रखते थे।
दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया

समय बीता और एक दिन दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवताओं, ऋषियों और राजाओं को आमंत्रित किया गया, किन्तु जानबूझकर शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा गया। जब सती को यज्ञ के विषय में ज्ञात हुआ, तो वे वहां जाने के लिए उत्सुक हुईं। शिव ने उन्हें समझाया कि बिना निमंत्रण जाना उचित नहीं है, और जहां अपमान की आशंका हो, वहां जाने से बचना चाहिए। परंतु सती ने यह सोचकर जाने का निश्चय किया कि पुत्री को अपने पिता के घर जाने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती।
जब सती यज्ञ स्थल पर पहुंचीं, तो वहां का दृश्य देखकर वे स्तब्ध रह गईं। किसी ने उनका स्वागत नहीं किया। उनके पिता दक्ष ने भी उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देखा। यज्ञ में शिव के लिए न तो कोई आसन रखा गया था और न ही उनका भाग निर्धारित किया गया था। कुछ लोगों ने तो शिव के प्रति कटु वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय व्यथा से भर उठा।
सती ने यज्ञ अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए
उन्होंने सभा में खड़े होकर कहा कि शिव संपूर्ण सृष्टि के आधार हैं, देवों के देव महादेव हैं, और उनका अपमान वास्तव में धर्म और सत्य का अपमान है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस पिता को उनके पति का सम्मान करना नहीं आता, उसके घर जन्म लेना उनके लिए लज्जा का विषय है। अपमान और पीड़ा से व्याकुल होकर सती ने यज्ञ अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए।
अपने केशों से वीरभद्र और भद्रकाली को उत्पन्न किया
जब यह समाचार शिव तक पहुंचा, तो वे शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठे। उन्होंने अपने केशों से वीरभद्र और भद्रकाली को उत्पन्न किया, जिन्होंने यज्ञ स्थल पर जाकर उसे ध्वस्त कर दिया और दक्ष का घमंड चूर कर दिया। तत्पश्चात शिव स्वयं वहां पहुंचे और सती के जले हुए शरीर को उठाकर विलाप करने लगे।
शिव का रौद्र रूप अत्यंत भयंकर था। वे सती के शरीर को कंधे पर लेकर तांडव करने लगे। उनका यह तांडव संहार का संकेत दे रहा था। संपूर्ण ब्रह्मांड में भय और अशांति फैल गई। देवताओं ने सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की।
विष्णु ने सृष्टि संतुलन बनाए रखने के लिए अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया। उन्होंने सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, ताकि शिव का मोह भंग हो और उनका क्रोध शांत हो सके। जहां-जहां सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
51 शक्तिपीठ आज भी श्रद्धा और भक्ति के केंद्र हैं
इन पवित्र स्थलों को शक्तिपीठ कहा गया, क्योंकि वहां देवी की शक्ति का वास माना गया। भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका तक फैले ये 51 शक्तिपीठ आज भी श्रद्धा और भक्ति के केंद्र हैं। प्रत्येक शक्तिपीठ का अपना विशेष महत्व है और वहां देवी के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है।
इस प्रकार माता सती की यह कथा त्याग, प्रेम और शक्ति की अद्वितीय गाथा है। यह हमें सिखाती है कि अपमान और अहंकार अंततः विनाश का कारण बनते हैं, जबकि भक्ति और समर्पण ही सच्ची शक्ति हैं। 51 शक्तिपीठ इस दिव्य कथा के जीवंत प्रतीक हैं, जो आज भी श्रद्धालुओं को आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।