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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > वाराणसी की मसान होली: जीवन, मृत्यु और आत्मबोध का पर्व
व्रत और त्योहार

वाराणसी की मसान होली: जीवन, मृत्यु और आत्मबोध का पर्व

दिव्यसुधा
Last updated: February 22, 2026 3:19 pm
दिव्यसुधा
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मणिकर्णिका घाट पर मसान होली के दौरान साधु और शिवभक्त भस्म से होली खेलते हुए।
मणिकर्णिका घाट पर मसान होली: जहां रंगों की जगह भस्म और भक्ति का संगम है।
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वाराणसी, जिसे काशी भी कहा जाता है, केवल तीर्थस्थल नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु की गहन अनुभूति का केंद्र है। यहाँ हर गली, घाट और मंदिर मृत्यु की अनित्यता और आत्मा की शाश्वतता का संदेश देते हैं। इसी काशी के पावन तट पर स्थित मणिकर्णिका घाट पर मनाई जाने वाली मसान होली एक अद्वितीय परंपरा है, जो जीवन और मृत्यु के द्वैत को समझने का अवसर प्रदान करती है। जब देशभर में लोग रंगों से होली खेलते हैं, तब मणिकर्णिका घाट पर चिताओं की अग्नि, उठता धुआँ और “राम नाम सत्य है” का स्वर इस पर्व को एक भिन्न आयाम देते हैं। यहाँ रंगों की जगह भस्म होती है—जो यह स्मरण कराती है कि प्रत्येक देह अंततः राख में विलीन हो जाती है। यह दृश्य बाहरी दृष्टि से विचित्र लग सकता है, पर भीतर से यह गहन आध्यात्मिक अनुभव है। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है। शिव श्मशान के स्वामी, विरक्ति और भस्म के देवता हैं। मान्यता है कि वे मृत्यु और जीवन के रहस्यों से परिचित हैं। यही कारण है कि मसान होली में मृत्यु को भय की दृष्टि से नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार मानकर उत्सव मनाया जाता है। जब व्यक्ति अपने शरीर पर भस्म लगाता है, तो वह नश्वरता को स्वीकार करता है और अहंकार, संपत्ति और पहचान के क्षणभंगुर होने का बोध करता है।

साधु-संत,और शिवभक्त ढोल-नगाड़ों की थाप पर भस्म की होली खेलते

इस परंपरा में डोम समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। यही समुदाय मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार का संचालन करता है। मसान होली के अवसर पर डोम राजा की उपस्थिति और नेतृत्व इस परंपरा की पवित्रता को सुरक्षित रखते हैं। उनके साथ साधु-संत, नागा बाबा और शिवभक्त ढोल-नगाड़ों की थाप पर भस्म की होली खेलते हैं, जिससे उत्सव में भक्ति और आध्यात्मिक उन्माद का संगम बनता है।

चिताओं की लपटों के बीच उठते धुएँ और हर हर महादेव के जयकारे

मसान होली केवल बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मबोध का पर्व है। चिताओं की लपटों के बीच उठते धुएँ, “हर हर महादेव” के जयघोष और राख के उड़ते कण जीवन के अंतिम सत्य की अनुभूति कराते हैं। यह उत्सव साधु-संतों के लिए शिवतत्व का अनुभव करने का अवसर भी है। नागा साधु, जो विरक्ति और तपस्या का प्रतीक हैं, इस दिन विशेष रूप से उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। उनके लिए श्मशान भयावह स्थान नहीं, बल्कि साधना का पवित्र स्थल है।मसान होली यह सिखाती है कि जीवन और मृत्यु अलग नहीं, बल्कि एक ही चक्र के दो पहलू हैं। जो जन्मा है, वह नश्वर है; पर आत्मा अमर है। आधुनिक जीवन में जहाँ लोग मृत्यु से दूरी बनाते हैं, यह परंपरा उसे स्वीकारने और आत्मा की शाश्वतता को समझने की शिक्षा देती है। यह पर्व अहंकार के त्याग, विनम्रता और सेवा के महत्व को भी उजागर करता है।

मसान होली विश्वभर के लोगों के लिए आकर्षण बन चुकी है

आज मसान होली विश्वभर के लोगों के लिए आकर्षण बन चुकी है। पर्यटक और शोधकर्ता इसे देखने आते हैं, न केवल उत्सव के लिए, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता की गहराई को समझने के लिए। हालांकि, इस परंपरा में संवेदनशीलता और मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है, क्योंकि मणिकर्णिका घाट शोक और अंतिम विदाई का स्थल भी है। अंततः, मसान होली जीवन को एक नई दृष्टि देती है। यह बताती है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन है; भय नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग है। जहाँ रंगों की जगह राख है, वहीं उस राख में जीवन का सबसे उज्ज्वल सत्य छिपा है। यह पर्व केवल होली नहीं बल्कि आस्था, वैराग्य और आत्मबोध का अद्वितीय संगम है—जो काशी की आत्मा को सबसे सटीक रूप में व्यक्त करता है।

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