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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व और पूजा विधि
व्रत और त्योहार

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व और पूजा विधि

दिव्यसुधा
Last updated: February 14, 2026 1:04 pm
दिव्यसुधा
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महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का जलाभिषेक करते श्रद्धालु, बेलपत्र और दूध अर्पित करते हुए, रात में पूजा और जागरण का दृश्य।
महाशिवरात्रि की पावन रात शिव-शक्ति के दिव्य मिलन, तप, भक्ति और आत्मचिंतन का प्रतीक है।
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महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और शक्ति का दिव्य मिलन हुआ था। कुछ कथाओं के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने समुद्र मंथन के दौरान निकला विष पीकर संसार की रक्षा की थी। इसलिए यह दिन त्याग, तपस्या और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं और पूरी रात जागरण करते हैं। दूध, जल, बेलपत्र, धतूरा, शहद आदि भगवान शिव को अर्पित किए जाते हैं। कई भक्त रात को चार प्रहर में पूजा करते हैं — शाम से सुबह तक अलग-अलग समय पर अभिषेक किया जाता है।

शुभ मुहूर्त

चतुर्दशी तिथि शुरू: 15 फरवरी शाम लगभग 5:04 बजे

चतुर्दशी तिथि समाप्त: 16 फरवरी शाम लगभग 5:34 बजे

निशीथ काल (सबसे शुभ समय): लगभग रात 12 बजे से 1 बजे के बीच

निशीथ काल को सबसे शुभ माना जाता है क्योंकि इसी समय शिवलिंग प्रकट होने की मान्यता है, इसलिए इस समय पूजा करने से विशेष फल मिलता है।   

महाशिवरात्रि की पावन रात की एक सुंदर कथा कही जाती है। कहते हैं कि माता पार्वती का जन्म हिमालय के घर हुआ था। बचपन से ही उनके मन में भगवान शिव के प्रति गहरा प्रेम और श्रद्धा थी। जब वे बड़ी हुईं, तो उन्होंने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या शुरू की। उन्होंने वर्षों तक उपवास किया और कठिन साधना की, लेकिन उनका विश्वास कभी डगमगाया नहीं। माता पार्वती की सच्ची भक्ति और समर्पण देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती जी को दर्शन दिए और विवाह के लिए सहमति दे दी। इसके बाद देवताओं और ऋषियों की उपस्थिति में उनका दिव्य विवाह कैलाश पर्वत पर हुआ। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि की रात इसी दिव्य मिलन की याद दिलाती है। यह पर्व सिखाता है कि सच्चे प्रेम, धैर्य और विश्वास से हर इच्छा पूरी हो सकती है।

पूजा विधि

महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान को साफ करके व्रत का संकल्प लें। शिवलिंग पर सबसे पहले जल या गंगाजल चढ़ाएं, फिर दूध अर्पित करें और दोबारा जल चढ़ाएं। इसके बाद बेलपत्र, सफेद फूल और चंदन अर्पित करें। “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। दिनभर व्रत रखें और फलाहार ले सकते हैं। रात में जागरण कर भजन, कीर्तन और शिव ध्यान करना शुभ माना जाता है। अगले दिन सुबह पूजा करके व्रत खोलें। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा से जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा आती है तथा कष्ट कम होते हैं।

विशेष महत्व

महाशिवरात्रि पर उपवास, ध्यान और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र जप करने से मन की शुद्धि, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। यह दिन आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए बहुत शुभ माना जाता है।

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