आज आश्विन मास की पूर्णिमा के दिन महर्षि वाल्मीकि जयंती मनाई जा रही है। महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि कहा जाता है क्योंकि उन्होंने पहली बार संस्कृत में “रामायण” जैसी अद्भुत रचना की, जिसे भगवान श्रीराम के जीवन की सबसे प्रमाणिक कथा माना गया है। उनका वास्तविक नाम रत्नाकर था और वे प्रारंभ में लूटपाट कर परिवार का पालन-पोषण करते थे। लेकिन जब देवर्षि नारद से उनका साक्षात्कार हुआ, तो उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने नारद जी से ज्ञान प्राप्त कर गहन तपस्या की और महर्षि के रूप में प्रसिद्ध हुए। तपबल और साधना के बल पर उन्होंने न केवल अपने जीवन को पवित्र बनाया, बल्कि मानवता को धर्म, नीति और आदर्श का मार्ग दिखाने वाली रामायण की रचना कर दी।
रामायण की रचना: महर्षि वाल्मीकि ने कई युग पहले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित रामायण की रचना की थी। इसमें उन्होंने श्रीराम के मानवीय गुणों और जीवन प्रसंगों का सुंदर और प्रेरणादायक वर्णन किया है।
संस्कृत में प्रथम काव्य: संस्कृत भाषा में लिखी गई वाल्मीकि रामायण को भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम के जीवन की सबसे शुद्ध और प्रमाणिक कथा माना जाता है।
रामायण की संरचना: वाल्मीकि रामायण में कुल 24,000 श्लोक और सात कांड हैं। माना जाता है कि इसकी रचना गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों से प्रेरित होकर “ॐ भूः भुवः स्वः” से हुई थी।
सीता और लव-कुश से संबंध: वाल्मीकि जी भगवान श्रीराम के समकालीन ऋषि थे। उन्होंने सीता माता को अपने आश्रम में शरण दी थी, वहीं पर लव और कुश का जन्म हुआ और उन्होंने यहीं से रामायण का प्रथम पाठ किया।
अयोध्या में मंदिर: अयोध्या में मणिरामदास छावनी स्थित श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण भवन में दीवारों पर रामायण के सभी 24,000 श्लोक अंकित हैं। यहां भगवान वाल्मीकि, लव और कुश की प्रतिमाएं विराजमान हैं। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के सप्त मंडपम में भी वाल्मीकि जी की प्रतिमा स्थापित की गई है।
जीवन से प्रेरणा: वाल्मीकि जयंती हमें यह संदेश देती है कि सच्ची आस्था, ज्ञान और तपस्या से कोई भी व्यक्ति महानता की ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।
रामायण का महत्व: वाल्मीकि रामायण का पाठ धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत फलदायी है। इसे पढ़ने या सुनने से व्यक्ति पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है और इसके उपदेश समाज में सद्भाव, नैतिकता और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा देते हैं।