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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > उज्जैन की मां प्रत्यंगिरा: रौद्र शक्ति और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री
मंदिर

उज्जैन की मां प्रत्यंगिरा: रौद्र शक्ति और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री

Ekta Mishra
Last updated: February 17, 2026 12:17 pm
Ekta Mishra
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उज्जैन स्थित मां प्रत्यंगिरा देवी मंदिर में सिंहमुखी रौद्र स्वरूप की प्रतिमा
उज्जैन में विराजमान मां प्रत्यंगिरा – रौद्र शक्ति और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री
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भारत की पावन धरती पर अनेक प्राचीन मंदिर ऐसे हैं, जिनका संबंध रामायण और महाभारत काल से जोड़ा जाता है। इन्हीं आध्यात्मिक स्थलों में मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित मां प्रत्यंगिरा देवी का मंदिर विशेष महत्व रखता है। महाकाल की नगरी उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग और बगलामुखी टेम्पल उज्जैन के बीच भैरवगढ़ रोड पर स्थित यह मंदिर शक्ति और तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

रौद्र रूप में विराजमान हैं मां
मां प्रत्यंगिरा का स्वरूप अत्यंत अद्भुत और प्रभावशाली है। उनका चेहरा सिंह के समान और शरीर देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो उन्हें भगवान नरसिंह की छवि से जोड़ता है। यह रौद्र रूप केवल क्रोध का प्रतीक नहीं, बल्कि अधर्म और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का संकेत है। देशभर में देवी के अनेक उग्र रूपों की पूजा होती है, किंतु मां प्रत्यंगिरा का स्वरूप विशिष्ट और दुर्लभ माना जाता है।

तंत्र की देवी के रूप में पूजा
मां प्रत्यंगिरा को तंत्र साधना की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे मां बगलामुखी को। मान्यता है कि उनके दर्शन मात्र से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। यदि किसी व्यक्ति पर तांत्रिक बाधा या नकारात्मक प्रभाव हो, तो यहां विशेष अनुष्ठान के माध्यम से उसका निवारण किया जाता है। भक्त अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए मां की आराधना करते हैं। तांत्रिक साधक भी अपनी साधना सिद्ध करने के लिए रात्रि में यहां विशेष पूजन करते हैं।

पौराणिक कथा और नरसिंह अवतार
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लिया और हिरण्यकश्यप का वध किया, तब उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। उनके उग्र रूप से देवता और असुर दोनों भयभीत हो उठे। तब सभी देवताओं के आह्वान पर मां प्रत्यंगिरा प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान नरसिंह के क्रोध को शांत किया। इस कथा से स्पष्ट होता है कि मां प्रत्यंगिरा केवल विनाश की नहीं, बल्कि संतुलन और शांति की भी प्रतीक हैं।

रावण की कुलदेवी के रूप में मान्यता
मान्यता है कि मां प्रत्यंगिरा ही निकुंबला देवी का स्वरूप हैं, जिन्हें रावण और उसके पुत्र मेघनाद अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते थे। रामायण में उल्लेख मिलता है कि युद्ध से पूर्व विजय प्राप्ति के लिए रावण और मेघनाद ने विशेष अनुष्ठान किए थे। इससे स्पष्ट है कि मां प्रत्यंगिरा को अजेयता और शत्रु विनाश की देवी माना जाता है।

उज्जैन की मां प्रत्यंगिरा का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शक्ति, साधना और आध्यात्मिक संतुलन का अद्वितीय केंद्र है, जहां श्रद्धा और रहस्य का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

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