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दिव्य सुधा > आरती/मंत्र > काशी के 84 घाट: मोक्ष की ओर ले जाने वाली पवित्र सीढ़ियाँ
आरती/मंत्र

काशी के 84 घाट: मोक्ष की ओर ले जाने वाली पवित्र सीढ़ियाँ

दिव्यसुधा
Last updated: February 22, 2026 3:58 pm
दिव्यसुधा
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“दशाश्वमेध घाट पर शाम की गंगा आरती में दीप जलते हुए और भक्त पूजा करते हुए।”
“काशी के 84 घाटों में से दशाश्वमेध घाट पर शाम को गंगा आरती का दिव्य दृश्य।”
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वाराणसी, जिसे काशी भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक ऐसा केंद्र है जहाँ जीवन और मृत्यु के रहस्य एक साथ देखे जा सकते हैं। यहां बहती गंगा नदी के किनारे स्थित 84 घाट केवल सीढ़ियाँ नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक घाट के पीछे एक गहरी आध्यात्मिक कथा छुपी है। पुराणों के अनुसार, जब सृष्टि की रचना हुई, तब मनुष्य को जन्म-मरण के 84 लाख योनियों के चक्र से गुजरना पड़ता था। देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि मानव को इस चक्र से मुक्ति दिलाई जाए। शिव ने काशी को अपनी नगरी बनाया और गंगा के तट पर 84 घाटों की स्थापना का आशीर्वाद दिया। कहा जाता है कि जो कोई इन घाटों पर स्नान करता है, ध्यान और भक्ति में लीन होता है, उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल सकती है। प्रत्येक घाट का अपना महत्व है—कुछ घाट तपस्या और ध्यान के लिए प्रसिद्ध हैं, कुछ घाट स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए। दशाश्वमेध घाट, असी घाट, हरिश्चंद्र घाट जैसे घाटों पर रोज़ाना भक्तों की उपस्थिति रहती है। घाट केवल पवित्र स्थान ही नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु, भक्ति और मोक्ष, समय और अनंत का प्रतीक भी हैं। ऋषि-मुनि सदियों से इन घाटों पर साधना करते आए हैं। उनकी साधना और ध्यान ने घाटों को और भी पवित्र बना दिया। समय के साथ भक्ति का स्तर घटने लगा, और लोगों का ध्यान सांसारिक जीवन की ओर अधिक हो गया। तब पंडितों और साधुओं ने एक नई परंपरा की शुरुआत की—गंगा आरती। इसका उद्देश्य लोगों को गंगा की दिव्यता और काशी की पवित्रता की याद दिलाना था।


गंगा आरती: श्रद्धा और अनुभव की दिव्य यात्रा

गंगा आरती का आरंभ दशाश्वमेध घाट से हुआ। शाम ढलते ही घाट पर दीप जलाए जाते हैं, शंख की ध्वनि गूंजती है और मंत्र उच्चारित किए जाते हैं। यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं देवता धरती पर उतर आए हों। आरती केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह काशी की प्राचीन कथाओं और मान्यताओं का जीवंत रूप है।आरती के दौरान भव्य थालियों में दीपों की रोशनी, घंटों और घंटियों की ध्वनि, और भक्तों के मंत्र मिलकर एक अद्वितीय आध्यात्मिक वातावरण बनाते हैं। घाटों पर उपस्थित हर व्यक्ति उस दिव्यता को महसूस करता है और उसकी आत्मा शांति और शुद्धि की ओर अग्रसर होती है। बच्चों से लेकर वृद्ध तक, सभी गंगा की महिमा और काशी की पवित्रता के अनुभव में लीन हो जाते हैं। गंगा आरती का महत्व केवल भौतिक रूप से दीप जलाने या मंत्र पढ़ने में नहीं है। यह मनुष्य को याद दिलाती है कि जीवन में भक्ति और विश्वास का मार्ग ही वास्तविक मुक्ति की कुंजी है। आरती का अनुभव व्यक्ति की आत्मा को शांति देता है, उसे सांसारिक जीवन के संघर्षों से ऊपर उठने का संदेश देता है और मोक्ष की ओर ले जाने वाली राह दिखाता है। आज भी, दशाश्वमेध घाट से लेकर असी घाट तक, हर शाम गंगा आरती का दृश्य लाखों भक्तों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जो हर उपस्थित व्यक्ति की आत्मा को छू जाता है। काशी के 84 घाट और गंगा आरती मिलकर यह संदेश देते हैं कि भक्ति, श्रद्धा और आत्मा की शुद्धि से ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य—मोक्ष—प्राप्त किया जा सकता है।

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