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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > कालाष्टमी 2026: काल भैरव की कृपा पाने का विशेष दिन, जानें तिथि, महत्व और पूजा विधि
व्रत और त्योहार

कालाष्टमी 2026: काल भैरव की कृपा पाने का विशेष दिन, जानें तिथि, महत्व और पूजा विधि

दिव्यसुधा
Last updated: April 10, 2026 12:19 pm
दिव्यसुधा
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10 अप्रैल 2026 कालाष्टमी पर काल भैरव की पूजा करते भक्त
कालाष्टमी पर काल भैरव की पूजा से भय, कष्ट और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
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हिंदू धर्म में कालाष्टमी का विशेष महत्व माना गया है। यह पर्व हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और इस दिन भगवान शिव के रौद्र स्वरूप काल भैरव की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काल भैरव की उपासना करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, भय समाप्त होता है और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। वैशाख मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि की शुरुआत 9 अप्रैल 2026 को रात 9 बजकर 18 मिनट से हो रही है और इसका समापन 10 अप्रैल 2026 को रात 11 बजकर 14 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार, कालाष्टमी का व्रत 10 अप्रैल, शुक्रवार को रखना शुभ माना गया है।

कालाष्टमी का धार्मिक महत्व
कालाष्टमी का दिन विशेष रूप से भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर व्यक्ति के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मानसिक शांति मिलती है। जो लोग किसी अनजाने भय, तनाव या चिंता से परेशान रहते हैं, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी होता है। साथ ही, काल भैरव की आराधना से शत्रुओं से रक्षा होती है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस व्रत को करने से पूर्व जन्म के पापों का प्रभाव कम होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

ग्रहों की स्थिति से क्यों खास है यह कालाष्टमी
इस वर्ष की कालाष्टमी ज्योतिषीय दृष्टि से भी खास मानी जा रही है। इस दिन शनि देव मीन राशि में अस्त हो रहे हैं, जबकि राहु कुंभ राशि में स्थित हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि और राहु दोनों ही ग्रह व्यक्ति के मन और जीवन की दिशा पर गहरा प्रभाव डालते हैं। ऐसे में काल भैरव की पूजा करने से इन ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है। इससे मानसिक स्थिरता मिलती है, भ्रम दूर होता है और जीवन में संतुलन बना रहता है।

काल भैरव की पूजा विधि
कालाष्टमी के दिन पूजा की शुरुआत प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में करनी चाहिए। सुबह उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर में भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करें, क्योंकि काल भैरव को भगवान शिव का ही अंश माना जाता है।


रात्रि के समय काल भैरव की पूजा करना अधिक शुभ माना जाता है। इसके लिए रात 9 बजे से 11 बजे के बीच का समय उत्तम होता है। पूजा के दौरान सबसे पहले गंगाजल से अभिषेक करें, फिर तिलक लगाकर अक्षत अर्पित करें। इसके बाद पुष्प चढ़ाएं और दीपक जलाकर आरती करें। पहले भगवान शिव की आरती करें और फिर काल भैरव की। यदि संभव हो तो शिव चालीसा और भैरव चालीसा का पाठ करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है।

काल भैरव को क्या अर्पित करें
काल भैरव की पूजा में कुछ विशेष वस्तुओं का अर्पण करना शुभ माना गया है। इनमें काला उड़द, सरसों का तेल, कच्चा दूध और मीठी रोटी प्रमुख हैं। कच्चे दूध से अभिषेक करना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। इसके अलावा, काल भैरव की सवारी कुत्ता मानी जाती है, इसलिए इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

दान का महत्व
कालाष्टमी के दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन दूध, काले वस्त्र, सरसों का तेल, जूते-चप्पल और भोजन सामग्री का दान करना शुभ माना गया है। हालांकि, दान हमेशा अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार ही करना चाहिए।

कालाष्टमी व्रत के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी का व्रत और पूजा करने से जीवन के कई कष्ट दूर हो जाते हैं। इससे मानसिक शांति मिलती है, भय समाप्त होता है और रोगों से राहत मिलती है। साथ ही, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सहायता मिलती है और व्यक्ति का जीवन सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता है। काल भैरव की कृपा से जीवन में साहस, आत्मविश्वास और सुरक्षा का भाव बढ़ता है।

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