सनातन धर्म में माघ मास और मौनी अमावस्या का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित त्रिवेणी संगम में इस पावन तिथि पर स्नान करने से पापों के क्षय और मोक्ष की प्राप्ति की मान्यता है। हाल ही में इसी अवसर पर ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम स्नान हेतु प्रयागराज पहुंचे थे। वहां उत्पन्न एक विवाद के कारण वे बिना गंगा स्नान किए ही लौट गए। इस घटना के बाद ज्योतिर्मठ एक बार फिर देशभर में चर्चा का विषय बन गया और लोगों के मन में यह जानने की जिज्ञासा बढ़ गई कि ज्योतिर्मठ क्या है और इसकी परंपरा कितनी प्राचीन है।
कौन हैं शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती वर्तमान में उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य हैं। उनका जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। संन्यास ग्रहण करने से पहले उनका नाम उमाशंकर उपाध्याय था। उन्होंने वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा प्राप्त की। 15 अप्रैल 2003 को उन्होंने दंड संन्यास की दीक्षा ली। उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उन्हें अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती नाम प्रदान किया।
ज्योतिर्मठ की स्थापना और उसका आध्यात्मिक महत्व
ज्योतिर्मठ की स्थापना लगभग आठवीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। यह मठ उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है और भारत के चार आम्नाय मठों में उत्तर दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की—उत्तर में ज्योतिर्मठ, दक्षिण में श्रृंगेरी मठ, पश्चिम में द्वारका मठ और पूर्व में गोवर्धन मठ। इन सभी मठों का मुख्य उद्देश्य अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार-प्रसार करना है। ज्योतिर्मठ के प्रथम आचार्य तोटकाचार्य थे, जो आदि शंकराचार्य के प्रमुख शिष्यों में से एक थे।
ज्योतिर्मठ का पुनर्गठन और उत्तराधिकार विवाद
समय के साथ ज्योतिर्मठ की गतिविधियां कुछ काल के लिए मंद पड़ गई थीं। वर्ष 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने इस मठ का पुनर्गठन किया। उनके देहावसान के बाद 1953 में उत्तराधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिसकी छाया आज तक दिखाई देती है। वर्तमान समय में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ के आचार्य के रूप में सनातन परंपरा का नेतृत्व कर रहे हैं।
आदि शंकराचार्य: सनातन धर्म के महान पुनर्स्थापक
आदि शंकराचार्य का जीवन स्वयं में एक दिव्य और प्रेरणादायक गाथा है। उनका जन्म केरल के कालड़ी गांव में हुआ था। बचपन से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। नर्मदा तट पर गोविंदपादाचार्य से दीक्षा प्राप्त कर उन्होंने पूरे भारत में पदयात्रा करते हुए अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार किया। उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखकर सनातन धर्म को पुनः प्रतिष्ठित किया।
आज का ज्योतिर्मठ और उसकी परंपरा
आज भी ज्योतिर्मठ में गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत तप, साधना और ज्ञान का अभ्यास किया जाता है। यहां दशनामी संप्रदाय के संन्यासी अद्वैत वेदांत दर्शन का अध्ययन करते हैं और समाज में आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करते हैं। ज्योतिर्मठ केवल एक मठ नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत धरोहर है, जो आज भी आत्मबोध और ब्रह्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त कर रही है।