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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > जितिया व्रत 2025: माताओं का निर्जला संकल्प, संतान की लंबी उम्र के लिए अर्पित तपस्या
व्रत और त्योहार

जितिया व्रत 2025: माताओं का निर्जला संकल्प, संतान की लंबी उम्र के लिए अर्पित तपस्या

15 सितंबर सुबह 06:15 बजे अष्टमी समाप्त होगी और उसी दिन व्रत का पारण किया जाएगा।

दिव्यसुधा
Last updated: September 2, 2025 5:41 pm
दिव्यसुधा
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मां का त्याग, संतान की दीर्घायु की कामना – यही है जितिया व्रत का सार
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Highlights
  • इस बार जितिया व्रत 14 सितंबर 2025 (रविवार) को रखा जाएगा।
  • 13 सितंबर को नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाएगी।
  • यह व्रत मां अपने पुत्र की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं।

हिंदू धर्म में मां के प्रेम और त्याग को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। कहा जाता है कि मां अपने बच्चे के लिए किसी भी कठिन तपस्या से पीछे नहीं हटती। इन्हीं महान व्रतों में से एक है जितिया व्रत, जिसे माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना से करती हैं। यह व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी युक्त अष्टमी को रखा जाता है और नवमी तिथि पर इसका पारण होता है।

कब है जितिया व्रत 2025?
देवघर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुद्गल ने बताया कि इस साल 13 सितंबर को नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाएगी। इस दिन महिलाएं पवित्र नदी में स्नान कर विशेष सामग्रियों जैसे तेल, खल्ली और झींगा के पत्तों पर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। इसके बाद माताएं उस तेल को अपने पुत्र के माथे पर लगाती हैं। इसके अगले दिन यानी 14 सितंबर को सुबह 08:41 बजे तक सप्तमी तिथि रहेगी, उसके बाद अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी। चूंकि इस दिन सप्तमी युक्त अष्टमी है, इसलिए 14 सितंबर को ही जितिया का व्रत रखा जाएगा।

नहाय-खाय की परंपरा: 13 सितंबर 2025
व्रत का पहला चरण होता है नहाय-खाय। इस दिन महिलाएं स्नान करके शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं और अगले दिन निर्जला व्रत की तैयारी करती हैं। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, 13 सितंबर को महिलाएं नदियों में स्नान कर पूजा करेंगी और पवित्र सामग्री चढ़ाकर भगवान जीमूतवाहन की आराधना करेंगी।

ओठगन और निर्जला उपवास: 14 सितंबर 2025
जितिया व्रत की सबसे खास बात है कि यह व्रत निर्जला रखा जाता है। यानी व्रती महिलाएं पूरे दिन और रात जल तक का सेवन नहीं करतीं। व्रत शुरू करने से पहले महिलाएं ओठगन करती हैं, यानी सूर्योदय से पहले थोड़ा भोजन या पानी ग्रहण कर लेती हैं। उसके बाद सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक कठोर उपवास करती हैं। इस साल 14 सितंबर (रविवार) को महिलाएं ओठगन के बाद व्रत का संकल्प लेंगी और पूरे दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी।

व्रत का पारण: 15 सितंबर 2025
व्रत का पारण यानी समापन अष्टमी समाप्त होने के बाद किया जाता है। इस बार 15 सितंबर को सुबह 06:15 बजे अष्टमी समाप्त होकर नवमी तिथि शुरू होगी। इसी समय महिलाएं स्नान कर तुलसी में जल अर्पित करेंगी और उसके बाद फलाहार या जल ग्रहण कर व्रत का समापन करेंगी।

क्यों किया जाता है जितिया व्रत?
जितिया व्रत की धार्मिक मान्यता बेहद गहरी है। शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान जीमूतवाहन ने नाग जाति के प्राणों की रक्षा की थी और उनके इस पराक्रम से प्रेरित होकर ही यह व्रत प्रचलित हुआ। माना जाता है कि जो माताएं पूरी श्रद्धा से यह व्रत करती हैं, उनके पुत्र को लंबी आयु, स्वास्थ्य और संकटों से सुरक्षा प्राप्त होती है। यही वजह है कि यह व्रत पूरे उत्तर भारत और खासकर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी श्रद्धा के साथ किया जाता है।

कठिन तपस्या: मातृत्व की शक्ति
जितिया व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसमें भोजन तो दूर, जल तक का सेवन वर्जित होता है। बावजूद इसके, माताएं अपने पुत्र की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से यह व्रत करती हैं। यह मातृत्व के असीम प्रेम और त्याग का जीता-जागता उदाहरण है।

धार्मिक दृष्टि से महत्व
यह व्रत आश्विन माह में आता है और पितृ पक्ष से जुड़ा होता है। व्रती महिलाएं इस दिन भगवान जीमूतवाहन की मूर्ति या चित्र की पूजा करती हैं। पूजा सामग्री में तेल, खल्ली, झींगा पत्ता, फल, फूल और धूप-दीप का प्रयोग होता है। व्रत करने से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि और दीर्घायु आती है लोक आस्था और उत्सव का रंग। देवघर, भागलपुर, मुंगेर, पटना, वाराणसी और गोरखपुर जैसे क्षेत्रों में इस व्रत का उल्लास देखते ही बनता है। गांव-गांव की महिलाएं समूह बनाकर पूजा करती हैं, भजन-कीर्तन गाती हैं और व्रत कथा का श्रवण करती हैं।

जितिया व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मां के त्याग और संकल्प का पर्व है। जब मां अपने बच्चे की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला उपवास करती है, तो यह मातृत्व की सबसे बड़ी मिसाल पेश करता है। 14 सितंबर 2025 को रखा जाने वाला यह व्रत न सिर्फ महिलाओं के विश्वास का प्रतीक है, बल्कि हिंदू संस्कृति की गहराई और मातृत्व की शक्ति का परिचायक भी है।

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