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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > जया एकादशी 2026: व्रत विधि, कथा, पारण समय और धार्मिक महत्व
व्रत और त्योहार

जया एकादशी 2026: व्रत विधि, कथा, पारण समय और धार्मिक महत्व

Ekta Mishra
Last updated: January 28, 2026 12:24 pm
Ekta Mishra
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जया एकादशी 2026 व्रत विधि, कथा और पारण समय भगवान विष्णु पूजा
जया एकादशी 2026: भगवान विष्णु की कृपा पाने का श्रेष्ठ व्रत
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सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। हर माह आने वाली दो एकादशियां न केवल पापों से मुक्ति दिलाती हैं, बल्कि मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करने का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। इन पवित्र तिथियों में माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का विशेष स्थान है। इसे विशेष रूप से भूत, प्रेत, पिशाच और नकारात्मक योनियों से मुक्ति दिलाने वाला श्रेष्ठ व्रत माना जाता है।

जया एकादशी 2026 की तिथि और पारण समय
इस वर्ष जया एकादशी का व्रत 29 जनवरी 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। व्रत का पारण 30 जनवरी 2026 को सुबह 06:41 बजे से 08:56 बजे तक किया जाएगा। माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी 28 जनवरी 2026 को शाम 04:35 बजे से प्रारंभ होकर 29 जनवरी दोपहर 01:55 बजे तक रहेगी। शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर करना अत्यंत आवश्यक है। समय पर पारण करने से ही व्रत पूर्ण माना जाता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

जया एकादशी व्रत की विधि
जया एकादशी व्रत का पालन करने के लिए प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। इसके बाद तन और मन को पवित्र करने के लिए स्नान करें और श्री हरि का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। घर के पूजा घर या ईशान कोण में विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करें। सबसे पहले शुद्ध जल अर्पित करें, फिर चंदन, रोली, दीप, धूप, फल, फूल, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें।

इसके बाद जया एकादशी व्रत की कथा सुनें या सुनाकर पाठ करें। कथा सुनने के बाद भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती करें। पूरे दिन व्रत का पालन करने के बाद अगले दिन शुभ मुहूर्त में पारण करें और भगवान विष्णु से अपने तथा अपने परिवार के लिए मंगलकामना करें।

जया एकादशी व्रत की कथा
हिंदू मान्यता के अनुसार, एक बार देवताओं के राजा इंद्र ने एक गंधर्व और उसकी पत्नी को क्रोध में पिशाच बनने का श्राप दे दिया। इसके बाद यह युगल वर्षों तक पृथ्वी पर पिशाच योनि में भटकते रहे। कई सालों तक कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करने के बाद उनकी भेंट देवर्षि नारद से हुई। नारद जी ने उन्हें माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करने की सलाह दी। दोनों ने श्रद्धापूर्वक उपवास रखा और पूरी रात भगवान नारायण का स्मरण किया। इस व्रत के प्रभाव से उनका श्राप समाप्त हो गया और वे पुनः दिव्य स्वरूप प्राप्त कर इंद्रलोक लौट गए। यही कारण है कि जया एकादशी को मुक्ति और पुण्य प्रदान करने वाली श्रेष्ठ तिथि माना जाता है।

जया एकादशी व्रत के नियम

  • एकादशी वाले दिन भोर में उठकर स्नान-ध्यान करें और सूर्य नारायण को अर्घ्य दें।
  • पीले या उजले रंग के कपड़े पहनें। काले रंग के कपड़े न पहनें।
  • तुलसी के पत्ते पहले से तोड़कर रखें; भूलकर भी उसी दिन तुलसी न तोड़ें।
  • चावल और तामसिक भोजन का सेवन न करें।
  • व्रत के दौरान कथा पाठ और आरती अवश्य करें। व्रत तब तक अधूरा रहता है जब तक इसका पारण शुभ मुहूर्त में न किया जाए।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • खाली समय में आलोचना या निंदा न करें, भजन, कीर्तन और मंत्र जप करें।

जया एकादशी का धार्मिक महत्व
जया एकादशी व्रत सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करता है और शत्रुओं पर विजय दिलाता है। इसका पालन करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। विधि-विधान से करने पर साधक को सुख-सौभाग्य, समृद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। विशेष रूप से माघ मास में पड़ने वाली जया एकादशी पर दान करने से साधक को तीन गुना पुण्य प्राप्त होता है। एकादशी की पूजा में भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती करना अत्यंत आवश्यक है। श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया व्रत व्यक्ति के जीवन में शांति, सकारात्मक ऊर्जा, खुशहाली और आध्यात्मिक उन्नति लाता है।

जया एकादशी व्रत आत्मा, मन और शरीर की शुद्धि का सर्वोत्तम साधन है। इसे विधि-विधान से करने वाले साधक पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा वर्षभर बनी रहती है। यह व्रत जीवन की सभी बाधाओं को दूर कर सुख, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करता है। अतः प्रत्येक भक्त को माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का व्रत श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक अवश्य करना चाहिए।

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