हिंदू धर्म में दान-पुण्य को अत्यंत श्रेष्ठ कर्म माना गया है। हमारे शास्त्रों में दान को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। प्राचीन काल से ही लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों, साधु-संतों और धार्मिक स्थलों पर दान करते आए हैं। मान्यता है कि दान करने से न केवल भगवान की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि मनुष्य के जीवन में आई बाधाएं, दुख और कष्ट भी दूर होते हैं। दान का भाविक अर्थ ही है त्याग, करुणा और सेवा। लेकिन अक्सर एक प्रश्न मन में उठता है यदि कोई साधु, संत या कोई भी व्यक्ति घर पर भिक्षा मांगने आए और हम देने में असमर्थ हों, तो क्या इससे पाप लगेगा या क्या वह श्राप दे सकता है? इस जिज्ञासा का उत्तर वृंदावन के प्रसिद्ध संत और आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज ने अत्यंत सरल शब्दों में दिया।
क्या दान न देने पर लगता है श्राप?
एक भक्त द्वारा पूछे गए इस प्रश्न पर प्रेमानंद महाराज ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास श्राप देने की वास्तविक शक्ति होती, तो वह द्वार-द्वार भटककर क्यों पूछता? जो साधु-संत केवल धन की अपेक्षा रखते हैं, वे घोर पाखंडी होते हैं। सच्चे संत न तो कभी धन की लालसा रखते हैं और न ही किसी को श्राप देने का विचार उनके मन में आता है। सच्चा संत तो केवल सभी के कल्याण की ही भावना रखता है। उन्होंने आगे कहा कि सच्चे महात्मा का क्रोध भी मंगलकारी होता है। जैसे कि पुराणों में उल्लेख मिलता है नारद जी ने नलकूबर और मणिग्रीव को श्राप देकर वृक्ष बना दिया था। यह कठोर लग सकता है, लेकिन उसी श्राप के कारण उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन और अंततः मोक्ष प्राप्त हुआ। इसलिए सच्चे संत के द्वारा दिया गया ‘श्राप’ भी अंततः जीव के कल्याण के लिए ही होता है।
किसे देना चाहिए दान?
प्रेमानंद महाराज ने दान के संबंध में एक महत्वपूर्ण बात कही दान हमेशा सुपात्र को ही दिया जाना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि कुपात्र को दान देना व्यर्थ और कभी-कभी हानिकारक तक हो सकता है। सुपात्र वह होता है जो दान के योग्य हो जो वास्तव में संयम, साधना और भगवान के प्रति समर्पण के मार्ग पर चलता हो। ऐसे संत दान को अपनी आवश्यकता से अधिक कभी स्वीकार नहीं करते। सच्चे साधु-संत भिक्षा इसलिए ग्रहण करते हैं ताकि उनका अभिमान नष्ट हो और वे संसार के प्रति निष्काम भाव बनाए रखें। प्राचीन परंपरा में साधु पाँच घरों से एक-एक रोटी लेकर भोजन करते थे। इससे न केवल उनकी दिनचर्या पूर्ण होती थी, बल्कि गृहस्थ भी दान और सेवा का पुण्य प्राप्त करते थे।
दान का मूल उद्देश्य
दान का उद्देश्य कभी भी प्रदर्शन, भय या मजबूरी नहीं होना चाहिए। दान तभी फलदायी होता है, जब वह निष्काम भावना से किया जाए। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि सात्त्विक दान वही है जो सही पात्र को, सही समय पर और बिना किसी अपेक्षा के दिया जाए।