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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार >  होली और भक्त प्रह्लाद की अद्भुत कथा
व्रत और त्योहार

 होली और भक्त प्रह्लाद की अद्भुत कथा

दिव्यसुधा
Last updated: February 27, 2026 3:35 pm
दिव्यसुधा
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भक्त प्रह्लाद अग्नि में बैठी होलिका के बीच सुरक्षित, भगवान नरसिंह का प्रकट होना दर्शाता धार्मिक चित्र
होलिका दहन और नरसिंह अवतार की कथा सत्य, भक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक है।
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होली भारत का एक अत्यंत प्राचीन, लोकप्रिय और आध्यात्मिक महत्व से जुड़ा हुआ पर्व है। सामान्यतः इसे रंगों, उमंग और उल्लास का त्योहार माना जाता है, परंतु इसके पीछे एक गहरी धार्मिक और नैतिक कथा छिपी है। यह पर्व केवल रंग खेलने का अवसर नहीं है, बल्कि यह सत्य की असत्य पर विजय, भक्ति की अहंकार पर जीत और विश्वास की शक्ति का प्रतीक है। होली का संबंध भक्त प्रह्लाद, असुर राजा हिरण्यकश्यप, होलिका और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से जुड़ी पौराणिक कथा से है। यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, सच्ची आस्था और सत्य की राह पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजयी होता है।

 हिरण्यकश्यप का अहंकार

प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था। वह बलशाली होने के साथ-साथ अत्यंत महत्वाकांक्षी और अहंकारी भी था। उसने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे एक अद्भुत वरदान प्राप्त किया। उसने वर मांगा कि उसकी मृत्यु न किसी मनुष्य से हो, न किसी पशु से; न दिन में हो, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर; न धरती पर, न आकाश में; और न किसी अस्त्र या शस्त्र से। ब्रह्मा जी ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे यह वरदान दे दिया। इस वरदान के कारण हिरण्यकश्यप को लगा कि अब वह अमर हो गया है। धीरे-धीरे उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि उसने स्वयं को भगवान समझना शुरू कर दिया। उसने अपने राज्य में आदेश दिया कि कोई भी किसी देवता की पूजा नहीं करेगा, केवल उसकी ही आराधना की जाएगी। जो उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता, उसे कठोर दंड दिया जाता।

 प्रह्लाद की अटूट भक्ति

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद था। बचपन से ही प्रह्लाद का मन भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था। कहा जाता है कि जब वह अपनी माता के गर्भ में था, तभी से उसे विष्णु भक्ति का ज्ञान प्राप्त हो गया था। वह हर समय “नारायण-नारायण” का जप करता और अपने मित्रों को भी भगवान की भक्ति का महत्व समझाता। जब हिरण्यकश्यप को यह ज्ञात हुआ कि उसका अपना पुत्र ही उसकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहा और विष्णु की भक्ति कर रहा है, तो वह अत्यंत क्रोधित हो उठा। उसने प्रह्लाद को समझाने की बहुत कोशिश की। उसने कहा, “मैं इस संसार का सबसे शक्तिशाली राजा हूं, मेरी पूजा करो।” परंतु प्रह्लाद ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “पिताश्री, सच्चे स्वामी तो भगवान विष्णु हैं। मैं उन्हीं की पूजा करूंगा।”

 पिता और पुत्र का संघर्ष

अपने पुत्र की इस अवज्ञा से हिरण्यकश्यप का क्रोध चरम पर पहुंच गया। उसने निश्चय किया कि वह प्रह्लाद को किसी भी तरह समाप्त कर देगा। उसने प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास किए। कभी उसे ऊँचे पर्वत से नीचे गिरवाया गया, कभी विषैले सर्पों के बीच डाल दिया गया। हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की गई, उसे विष दिया गया, यहाँ तक कि उसे समुद्र में भी फेंक दिया गया। लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। इन घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति में अपार शक्ति होती है। जब मन अडिग विश्वास से भरा हो, तो ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।

 होलिका दहन की घटना

हिरण्यकश्यप की बहन का नाम होलिका था। उसे एक विशेष वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यप ने एक योजना बनाई। उसने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए। उसका विचार था कि प्रह्लाद जल जाएगा और होलिका सुरक्षित बच जाएगी। होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ गई। चारों ओर अग्नि की लपटें उठने लगीं। लेकिन चमत्कार हुआ—भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया और होलिका स्वयं अग्नि में जलकर भस्म हो गई। यह घटना इस सत्य को दर्शाती है कि जो शक्ति और वरदान का दुरुपयोग करता है, उसका अंत निश्चित है। इसी घटना की स्मृति में आज भी होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है। लोग इस अग्नि में अपने अंदर की बुराइयों, अहंकार और नकारात्मकता को जलाने का संकल्प लेते हैं।

भगवान नरसिंह का अवतार

होलिका की मृत्यु के बाद भी हिरण्यकश्यप का क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने प्रह्लाद को चुनौती दी और पूछा, “अगर तुम्हारा भगवान हर जगह है, तो क्या वह इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने दृढ़ विश्वास से कहा, “हाँ, भगवान सर्वव्यापी हैं।” क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने खंभे पर प्रहार किया। उसी क्षण खंभे से भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर प्रकट हुए। उनका स्वरूप अद्भुत था—आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में। उन्होंने संध्या समय (न दिन, न रात), राजमहल के द्वार पर (न अंदर, न बाहर), अपनी गोद में उठाकर (न धरती पर, न आकाश में) और अपने नाखूनों से (न अस्त्र, न शस्त्र) हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान का भी उल्लंघन नहीं हुआ और अधर्म का अंत भी हो गया।

होली का गहरा संदेश

भक्त प्रह्लाद की यह कथा हमें अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएँ देती है। पहली शिक्षा यह है कि सच्ची भक्ति और विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाते। चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, यदि मन में अटूट श्रद्धा है, तो ईश्वर स्वयं रक्षा करते हैं। दूसरी शिक्षा यह है कि अहंकार का अंत निश्चित है। चाहे व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि वह धर्म और सत्य के मार्ग से भटक जाता है, तो उसका पतन निश्चित है। तीसरी शिक्षा यह है कि सत्य की हमेशा जीत होती है। असत्य और अन्याय कुछ समय के लिए प्रभावी हो सकते हैं, परंतु अंततः सत्य ही विजयी होता है।

 आज के जीवन में होली का महत्व

आज के समय में भी यह कथा उतनी ही प्रासंगिक है जितनी प्राचीन काल में थी। हमारे भीतर भी कभी-कभी अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मकता जन्म ले लेते हैं। होलिका दहन हमें प्रेरित कराता है कि हम इन बुराइयों को अपने जीवन से समाप्त करें। अगले दिन जब हम रंगों से खेलते हैं, तो यह इस बात का प्रतीक है कि जीवन में प्रेम, भाईचारा और नई शुरुआत का स्वागत करें। रंग हमें यह सिखाते हैं कि भिन्नता में भी सुंदरता होती है। इस प्रकार होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संदेश है—भक्ति की शक्ति, सत्य की विजय और प्रेम का उत्सव। भक्त प्रह्लाद की कथा हमें जीवन में अडिग विश्वास और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यही होली का वास्तविक और गहन अर्थ है।

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