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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > होली 2026: आस्था, रंग और पौराणिक कथाओं का पावन उत्सव
व्रत और त्योहार

होली 2026: आस्था, रंग और पौराणिक कथाओं का पावन उत्सव

Ekta Mishra
Last updated: February 21, 2026 3:27 pm
Ekta Mishra
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होली 2026 का पावन उत्सव, होलिका दहन और भगवान शिव-कृष्ण से जुड़ी पौराणिक कथाएं
होली 2026: रंगों में छिपा प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिक संदेश।
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होली हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत लोकप्रिय त्योहार है, जिसे रंग, उल्लास और आपसी प्रेम के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय और रिश्तों में नई मिठास भरने का प्रतीक भी है। हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। द्रिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में होली का पर्व 4 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और जीवन में सकारात्मकता का स्वागत करते हैं।

होली से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जो इस पर्व के आध्यात्मिक महत्व को और गहरा बनाती हैं। इनमें भगवान शिव, माता पार्वती और कामदेव की कथा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

भगवान शिव और कामदेव की कथा
कथा के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं। वे कठोर तप और उपासना कर रही थीं, लेकिन भगवान शिव गहरी तपस्या में लीन थे और उनका ध्यान संसार से परे था। देवताओं ने सोचा कि यदि शिव और पार्वती का विवाह हो जाए तो सृष्टि का संतुलन बना रहेगा। तब प्रेम के देवता कामदेव ने शिव जी की तपस्या भंग करने का निश्चय किया।

कामदेव ने भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाया। बाण लगते ही शिव जी का ध्यान टूटा, परंतु वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। क्रोध में उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी, जिसकी अग्नि से कामदेव भस्म हो गए। यह घटना सभी देवताओं के लिए अत्यंत दुखद थी। बाद में कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव से प्रार्थना की और बताया कि कामदेव ने यह कार्य माता पार्वती की सहायता के लिए किया था। तब शिव जी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कामदेव को अगले जन्म में प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। मान्यता है कि इस घटना के बाद देवताओं ने प्रसन्न होकर रंगों से उत्सव मनाया, जिसे होली की परंपरा से जोड़ा जाता है।

राधा और श्रीकृष्ण की रंगभरी होली
रंगों की होली का संबंध राधा और श्रीकृष्ण की प्रेम कथा से भी जुड़ा है। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार बाल कृष्ण ने अपनी माता यशोदा से पूछा कि वे राधा की तरह गोरे क्यों नहीं हैं। इस पर माता ने हंसी-ठिठोली में कहा कि वे राधा के चेहरे पर रंग लगा दें। इसके बाद कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेलना प्रारंभ किया। तभी से ब्रज में रंगों की होली की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी अत्यंत उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है।

इस प्रकार होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, भक्ति और आध्यात्मिक संदेशों से जुड़ा एक महान उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, अंततः सत्य और प्रेम की ही विजय होती है।

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