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दिव्य सुधा > सनातन धर्म > मंदिर > यहां शिव परिवार के साथ विराजते हैं, कुबेर देव धनतेरस पर होती है तंत्र पूजा
मंदिर

यहां शिव परिवार के साथ विराजते हैं, कुबेर देव धनतेरस पर होती है तंत्र पूजा

दिव्यसुधा
Last updated: October 16, 2025 7:03 pm
दिव्यसुधा
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मंदसौर के खिचलीपुरा स्थित भगवान कुबेर मंदिर, जहां शिव परिवार के साथ विराजमान हैं कुबेर देवता।
मंदसौर के खिचलीपुरा गांव में भगवान कुबेर का मंदिर — जहां आज तक नहीं लगा ताला और धनतेरस पर होती है विशेष तंत्र पूजा।
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दिवाली का पर्व आने वाला है, और इसी पावन अवसर पर लोग मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करते हैं ताकि घर में सुख, संपन्नता और समृद्धि बनी रहे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्यप्रदेश की धरती पर एक ऐसा दुर्लभ मंदिर है, जहां भगवान कुबेर स्वयं शिव परिवार के साथ विराजमान हैं? इस मंदिर के दर्शन मात्र से ही आर्थिक परेशानियां दूर होने की मान्यता है। आइए जानते हैं इस रहस्यमय और चमत्कारी मंदिर के बारे में विस्तार से।

मंदसौर का चमत्कारी कुबेर मंदिर

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के खिचलीपुरा गांव में स्थित भगवान कुबेर का यह मंदिर भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। यह देश का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है जहां धन के देवता भगवान कुबेर, भगवान शिव और माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। धार्मिक मान्यता है कि यहां दर्शन करने वाले भक्त की हर मनोकामना पूर्ण होती है और आर्थिक संकट समाप्त हो जाते हैं।

यह मंदिर न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि इसका वातावरण भक्ति और दिव्यता से ओतप्रोत रहता है। दीपावली और धनतेरस के अवसर पर यहां विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर को दीपों से सजाया जाता है और श्रद्धालुओं की भीड़ दूर-दूर से दर्शन के लिए उमड़ पड़ती है।

गर्भगृह पर आज तक नहीं लगा ताला

इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि मंदिर के गर्भगृह पर आज तक कभी ताला नहीं लगाया गया। मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव और भगवान कुबेर इस स्थान की रक्षा करते हैं, इसलिए यहां कभी कोई अनिष्ट नहीं हुआ। यह मंदिर सालभर भक्तों के लिए खुला रहता है और यहां दिन-रात पूजा होती रहती है। भक्तों का विश्वास है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान कुबेर और शिव परिवार की आराधना करता है, उसे कभी धन की कमी नहीं होती और उसके घर में सुख-शांति बनी रहती है।

प्राचीन इतिहास और स्थापत्य

कुबेर मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। कहा जाता है कि इस मंदिर की प्रतिमा 7वीं शताब्दी में स्थापित की गई थी। कुछ विद्वानों का मानना है कि मंदिर का निर्माण मराठा शासनकाल में हुआ था, जबकि अन्य का कहना है कि यह खिलजी शासनकाल में बना था, और इसी कारण इस क्षेत्र का नाम “खिलचीपुरा” पड़ा। यह मंदिर आकार में बड़ा नहीं है, लेकिन इसकी आभा अलौकिक है। विशेष बात यह है कि इस मंदिर की नींव नहीं रखी गई, बल्कि यह स्वाभाविक रूप से धरती पर स्थापित हुआ है। कहा जाता है कि इसी वजह से मंदिर का निर्माण आगे नहीं बढ़ाया गया और यह अपने मूल स्वरूप में ही पूजनीय बना हुआ है।

भगवान कुबेर की अद्भुत प्रतिमा

मंदिर में विराजमान भगवान कुबेर की चतुर्भुजी प्रतिमा अत्यंत अद्भुत और दिव्य है। उनके चार हाथों में धन की पोटली, प्याला और अस्त्र-शस्त्र हैं। भगवान कुबेर को नेवले पर सवार दिखाया गया है, जो धन-संपन्नता और रक्षण का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि संपूर्ण भारत में केवल दो ही ऐसे मंदिर हैं जहां भगवान कुबेर भगवान शिव के साथ विराजमान हैं एक उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर में और दूसरा मंदसौर जिले के खिचलीपुरा कुबेर मंदिर में। इस कारण यह मंदिर केदारनाथ जितना ही पूजनीय माना जाता है।

धनतेरस पर तंत्र पूजा का विशेष महत्व

धनतेरस के दिन इस मंदिर में विशेष तंत्र पूजा की जाती है। यह पूजा सुबह 4 बजे आरंभ होती है और इसके बाद ही भक्तों के लिए दर्शन का द्वार खुलता है। तंत्र पूजा का उद्देश्य नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर जीवन में धन, शांति और समृद्धि का संचार करना होता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान कुबेर तंत्र संबंधी सभी दोषों को दूर करने में सहायक हैं। इस दिन की गई पूजा विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी मानी जाती है जो कर्ज या आर्थिक संकट से गुजर रहे हों।

गर्भगृह में शिवलिंग और गुप्त रहस्य

मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव की भी प्रतिमा विराजमान है। यहां जल अर्पण की विशेष परंपरा है भक्त जो जल शिवलिंग पर चढ़ाते हैं, वह गर्भगृह से बाहर नहीं निकलता। माना जाता है कि यह जल सीधे भगवान शिव और भगवान कुबेर तक पहुंचता है। यह रहस्यमय घटना सदियों से मंदिर की दिव्यता का प्रतीक बनी हुई है। भक्तों का विश्वास है कि इस स्थान पर पूजा करने से तंत्र और ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है। यहां चढ़ाया गया दीपक और जल भगवान कुबेर की कृपा पाने का माध्यम बनता है।

कुबेर मंदिर की मान्यताएं और श्रद्धा

यहां आने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि भगवान कुबेर की कृपा से उनके जीवन में धन की वृद्धि होती है। व्यापारी वर्ग विशेष रूप से दीपावली से पहले इस मंदिर में आकर विशेष पूजा करता है ताकि पूरे वर्ष व्यापार में लाभ हो। धार्मिक ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है कि कुबेर देवता केवल धन के स्वामी ही नहीं, बल्कि न्याय और नैतिकता के प्रतीक हैं। इसलिए जो व्यक्ति सच्चाई और परिश्रम के मार्ग पर चलता है, कुबेर उसकी हर इच्छा पूर्ण करते हैं।

मंदिर में दीपावली की रौनक

हर वर्ष दीपावली के अवसर पर खिचलीपुरा कुबेर मंदिर में भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है। मंदिर को फूलों, रोशनी और दीपों से सजाया जाता है। भक्तगण पूरे परिवार सहित दर्शन के लिए आते हैं और भगवान कुबेर से अपने जीवन में सुख, समृद्धि और उन्नति की कामना करते हैं। मंदिर परिसर में भजन, कीर्तन और आरती का आयोजन होता है। रात्रि के समय जब सैकड़ों दीप जलते हैं, तो मंदिर का दृश्य स्वर्ग के समान प्रतीत होता है।

भक्तों के लिए आस्था का केंद्र

खिचलीपुरा कुबेर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह आस्था, भक्ति और विश्वास का केंद्र है। यहां आने वाला हर भक्त महसूस करता है कि उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ है। शिव परिवार और कुबेर देव की संयुक्त उपासना का यह स्थान अपने आप में अनोखा है। यह मंदिर हमें यह सिखाता है कि जहां भक्ति और विश्वास होता है, वहां कभी ताला नहीं लगता न दरवाज़े पर, न दिल पर।

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