आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित पारशुरामेश्वर मंदिर भारत के प्रमुख शिवधामों में से एक है। यह मंदिर सिर्फ़ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इस मंदिर में स्थापित गुडीमल्लम शिवलिंग को भारत का सबसे प्राचीन शिवलिंग माना जाता है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें भगवान शिव का साकार और निराकार दोनों रूप एक साथ दिखाई देते हैं, जो भारतीय शैव परंपरा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं।
गुडीमल्लम शिवलिंग की उत्पत्ति और ऐतिहासिक महत्व
इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार, गुडीमल्लम शिवलिंग की रचना लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व से पहली सदी ईस्वी के बीच की गई थी। इसका निर्माण दक्षिण भारत की प्रारंभिक मूर्तिकला शैली में हुआ है, जो तत्कालीन धार्मिक और सांस्कृतिक विकास की झलक प्रस्तुत करती है। सामान्य रूप से शिवलिंग निराकार शक्ति का प्रतीक होता है, लेकिन गुडीमल्लम लिंगम में भगवान शिव को मानवीय आकृति में दर्शाया गया है। यह इसे अन्य सभी शिवलिंगों से भिन्न और अत्यंत विशिष्ट बनाता है।
इस लिंगम में भगवान शिव एक बौनी आकृति के ऊपर खड़े दिखाई देते हैं। यह मूर्ति मानव और दैवीय तत्वों का संगम है, जो शिव के “निर्गुण और सगुण” स्वरूप को एक साथ प्रकट करती है। यही कारण है कि यह शिवलिंग न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि कलात्मक और ऐतिहासिक रूप से भी अद्वितीय है।
गुडीमल्लम लिंगम से जुड़ी पौराणिक कथा
गुडीमल्लम लिंगम की कथा ऋषि परशुराम से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि परशुराम जी ने अपनी माता के वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उन्होंने जंगल में एक लिंग स्थापित किया और प्रतिदिन उस पर जल और पुष्प अर्पित करते थे। फूलों की रक्षा के लिए उन्होंने यक्षी चित्रसेन को नियुक्त किया। एक दिन चित्रसेन ने उन्हीं फूलों से शिव की पूजा कर दी, जिससे परशुराम क्रोधित हो उठे और युद्ध आरंभ हो गया। तभी भगवान शिव प्रकट हुए और दोनों को अपने में समाहित कर लिया। कथा के अनुसार, इस लिंग में ब्रह्मा चित्रसेन के रूप में, विष्णु परशुराम के रूप में और शिव स्वयं लिंगम के रूप में विराजमान हैं। यही कारण है कि इसे त्रिदेव स्वरूप शिवलिंग कहा जाता है।
पारशुरामेश्वर मंदिर का धार्मिक महत्व
इस मंदिर का नाम भगवान परशुराम के नाम पर पड़ा पारशुरामेश्वर मंदिर। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान परशुराम ने तपस्या कर शिवजी से वरदान प्राप्त किया था। यह स्थान न केवल एक तीर्थस्थल है बल्कि आत्मा को शिव तत्व से जोड़ने का माध्यम भी है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि गुडीमल्लम लिंगम की पूजा से सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां की शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा भक्तों को शिव के साक्षात दर्शन का अनुभव कराती है।
गुडीमल्लम शिवलिंग की विशेषताएं
- यह भारत का सबसे प्राचीन शिवलिंग माना जाता है, जो लगभग दो हजार साल पुराना है।
- इसमें भगवान शिव की मानवीय आकृति खुदी हुई है, जो एक बौने जैसी आकृति पर खड़ी है।
- यह शैली भारतीय कला की प्राचीनतम शैव प्रतिमाओं का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
- यह लिंगम साकार और निराकार दोनों स्वरूपों का संगम है जो शिव के ‘अदृश्य और दृश्य’ दोनों पक्षों को एक साथ प्रकट करता है।
गुडीमल्लम लिंगम का आध्यात्मिक संदेश
गुडीमल्लम लिंगम हमें यह सिखाता है कि ईश्वर केवल एक आकार या स्वरूप तक सीमित नहीं हैं। शिव का यह रूप दर्शाता है कि सृष्टि में साकार और निराकार दोनों ही एक ही ऊर्जा के दो पक्ष हैं। यही वह दर्शन है, जो भारतीय अध्यात्म को विश्व के अन्य धर्मों से अलग बनाता है।
गुडीमल्लम शिवलिंग केवल एक प्राचीन मूर्ति नहीं, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक चेतना, कला और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यह स्थान भक्तों के लिए श्रद्धा का केंद्र और इतिहासकारों के लिए अध्ययन का विषय है। यहां की हर ईंट, हर मूर्ति और हर कथा में शिव का अनंत स्वरूप झलकता है जो साकार में निराकार और निराकार में साकार हैं।