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दिव्य सुधा > व्रत और त्योहार > गणगौर व्रत कथा: अटल सुहाग और दिव्य आस्था की पावन कहानी
व्रत और त्योहार

गणगौर व्रत कथा: अटल सुहाग और दिव्य आस्था की पावन कहानी

Ekta Mishra
Last updated: March 21, 2026 1:07 pm
Ekta Mishra
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गणगौर व्रत कथा और शिव-पार्वती की दिव्य पूजा
गणगौर व्रत: अटल सुहाग और भक्ति की शक्ति
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गणगौर व्रत हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखने वाला पर्व है, जिसे हर साल चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत खासतौर पर विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इसकी पूजा से अटल सुहाग और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के साथ इस कथा का पाठ करने से व्रत का पूर्ण फल मिलता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव, माता पार्वती और नारद मुनि पृथ्वी पर भ्रमण करने आए। संयोगवश उस दिन चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी, जिसे गौरी तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। जब गांव के लोगों को उनके आगमन का समाचार मिला, तो सभी महिलाएं अपने-अपने सामर्थ्य अनुसार फल, फूल और पूजन सामग्री लेकर उनके स्वागत के लिए पहुंचीं।

सबसे पहले निर्धन महिलाएं सादगी और सच्चे भाव से भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुंचीं। उनकी भक्ति और समर्पण देखकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपने हाथों में जल लेकर उन महिलाओं पर “सुहाग रस” छिड़क दिया और उन्हें अटल सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। माता ने कहा कि उनका सुहाग सदैव अखंड रहेगा और उनका वैवाहिक जीवन सुख-समृद्धि से भरा रहेगा।

कुछ समय बाद गांव की धनी महिलाएं भी सुंदर वस्त्रों और अनेक प्रकार की पूजन सामग्री के साथ वहां पहुंचीं। उन्हें देखकर भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा कि आपने तो सारा सुहाग रस पहले ही निर्धन महिलाओं को दे दिया, अब इन महिलाओं को क्या देंगी? इस पर माता पार्वती मुस्कुराते हुए बोलीं कि उन महिलाओं को उन्होंने बाहरी सुहाग का आशीर्वाद दिया है, जबकि इन महिलाओं को वह अपने समान सौभाग्य प्रदान करेंगी। इसके बाद माता पार्वती ने अपनी उंगली से रक्त निकालकर उन महिलाओं पर छिड़क दिया, जो उनके विशेष और दिव्य आशीर्वाद का प्रतीक था। इस प्रकार माता ने सभी महिलाओं को उनके भाव और श्रद्धा के अनुसार सुहाग का वरदान प्रदान किया।

इसके पश्चात माता पार्वती, भगवान शिव की आज्ञा लेकर नदी तट पर स्नान करने गईं। स्नान के बाद उन्होंने बालू से एक शिवलिंग का निर्माण किया और पूरी श्रद्धा के साथ उसकी पूजा-अर्चना की। पूजा के उपरांत उन्होंने शिवलिंग की परिक्रमा की और ध्यान में लीन हो गईं। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी शिवलिंग से प्रकट हुए और माता को आशीर्वाद दिया। तब माता पार्वती ने यह वरदान दिया कि जो भी स्त्री इस तिथि पर शिव-गौरी की पूजा करेगी, उसे अटल सुहाग और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होगा।

इसी दौरान, जब माता पार्वती शिवजी के पास लौटीं, तो उन्हें आने में विलंब हो गया था। भगवान शिव ने कारण पूछा, तो माता ने मुस्कुराकर कहा कि उन्हें नदी किनारे अपने भाई और भाभी मिल गए थे, इसलिए वे उनसे मिलने में व्यस्त हो गईं। भगवान शिव उनकी बात समझ गए और बोले कि वे भी उनसे मिलना चाहेंगे।

इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और नारद मुनि नदी तट की ओर चल पड़े। माता पार्वती मन ही मन प्रार्थना करने लगीं कि हे प्रभु, मेरी बात की लाज रखना। जब वे वहां पहुंचे, तो उन्हें एक भव्य महल दिखाई दिया, जिसमें माता पार्वती के कथित भाई-भाभी उपस्थित थे। भगवान शिव और माता पार्वती ने उनके साथ कुछ समय व्यतीत किया।

कुछ समय बाद माता पार्वती ने शिवजी से कैलाश लौटने का आग्रह किया, लेकिन शिवजी वहां से जाने के लिए तैयार नहीं थे। अंततः माता अकेले ही वहां से चली गईं और कुछ समय बाद शिवजी भी उनके पीछे चल पड़े। रास्ते में शिवजी को ध्यान आया कि उनकी माला उसी स्थान पर रह गई है, इसलिए उन्होंने नारद मुनि को उसे लाने के लिए भेजा।

जब नारद मुनि वापस उस स्थान पर पहुंचे, तो वहां न कोई महल था और न ही कोई व्यक्ति। चारों ओर केवल जंगल ही जंगल था। उन्होंने एक पेड़ पर शिवजी की माला लटकी हुई देखी और उसे लेकर वापस आ गए। उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि यह कैसी माया थी? तब शिव और पार्वती मुस्कुराए और बोले कि यह सब देवी की माया थी।

अंत में नारद मुनि ने कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करेगा, उनके जीवन में प्रेम, सुख और सौभाग्य हमेशा बना रहेगा। यही गणगौर व्रत का मूल संदेश है, जो भक्ति, प्रेम और आस्था की शक्ति को दर्शाता है।

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