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दिव्य सुधा > अन्य > गंगाजल की महिमा: आस्था, परंपरा और जीवन का पवित्र प्रवाह
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गंगाजल की महिमा: आस्था, परंपरा और जीवन का पवित्र प्रवाह

Ekta Mishra
Last updated: February 17, 2026 3:28 pm
Ekta Mishra
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गंगाजल की बोतल और गंगा नदी का पवित्र दृश्य
गंगाजल: भारतीय संस्कृति, आस्था और आध्यात्मिक जीवन का पवित्र प्रवाह
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भारत में यदि किसी नदी को ‘मां’ का दर्जा मिला है, तो वह है गंगा। गंगा केवल जल की धारा नहीं, बल्कि भारतीय चेतना, संस्कृति और आध्यात्मिक जीवन की बहती हुई पहचान है। बचपन में घर के मंदिर में रखी छोटी-सी गंगाजल की बोतल से लेकर जीवन के अंतिम संस्कार तक, यह पवित्र जल हर महत्वपूर्ण मोड़ पर हमारे साथ रहता है। प्रश्न यह उठता है कि आखिर गंगाजल को इतना पवित्र क्यों माना जाता है? क्यों कहा जाता है कि इसका एक छींटा भी वातावरण को बदल देता है? इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि गहरी परंपराएं, अनुभव और व्यावहारिक कारण भी जुड़े हुए हैं।

सनातन परंपरा में गंगाजल का महत्व
हिंदू धर्म में गंगा को ‘पतितपावनी’ कहा गया है, अर्थात वह जो पापों का नाश कर आत्मा को पवित्र कर दे। पौराणिक मान्यता के अनुसार गंगा का उद्गम भगवान विष्णु के चरणों से हुआ और भगवान शिव की जटाओं में समाकर वह धरती पर अवतरित हुईं। इसी कारण गंगाजल को चरणामृत के समान पवित्र माना जाता है।

कई श्रद्धालु बताते हैं कि गंगा तट पर बैठते ही मन को अद्भुत शांति का अनुभव होता है। मानो जीवन की भागदौड़ कुछ क्षणों के लिए थम जाती है। गंगा केवल बाहरी शुद्धि नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक संतुलन का भी प्रतीक है।

विष्णु का चरणामृत क्यों कहलाता है गंगाजल
धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के अंगूठे से निकला दिव्य जल ही गंगा बना। इसी वजह से इसे अमृत समान माना गया है। मान्यता है कि इसके स्पर्श या सेवन से जीवन के दोष कम होते हैं और नकारात्मकता दूर होती है।

राजा भगीरथ की तपस्या और उनके प्रयासों से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। यह कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि गंगा को पीढ़ियों के उद्धार का माध्यम माना गया है। आज भी लोग अपने पूर्वजों की शांति के लिए गंगा तट पर पिंडदान और तर्पण करते हैं।

गंगाजल कब भरना माना जाता है शुभ
वैसे तो गंगाजल किसी भी दिन लिया जा सकता है, लेकिन कुछ तिथियां विशेष रूप से पुण्यकारी मानी जाती हैं। अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी, संक्रांति, गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा जैसे अवसरों पर गंगाजल भरना अत्यंत शुभ माना जाता है। सोमवार और महाशिवरात्रि के दिन भी इसका विशेष महत्व बताया गया है।

परंपरा के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में गंगाजल भरना श्रेष्ठ माना जाता है। सुबह का यह समय शांत और सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है। माना जाता है कि इस समय लिया गया जल अधिक पवित्र और शुभ फलदायी होता है।

घर में गंगाजल रखने के नियम
गंगाजल को घर की उत्तर दिशा में या पूजा घर में साफ और पवित्र स्थान पर रखना चाहिए। इसे पीतल, तांबे या कांसे के पात्र में रखना सर्वोत्तम माना गया है। यदि गंगाजल प्लास्टिक की बोतल में लाया गया हो, तो घर पहुंचते ही उसे धातु के पात्र में स्थानांतरित कर देना चाहिए।

गंगाजल को अंधेरी, गंदी या अपवित्र जगह पर नहीं रखना चाहिए। इसे छूते समय भी स्वच्छता और श्रद्धा का ध्यान रखना आवश्यक है। मान्यता है कि आस्था और अनुशासन साथ-साथ चलते हैं।

गंगाजल से जुड़ी सावधानियां
गंगाजल लाने से पहले स्नान करना उचित माना गया है। अशुद्ध अवस्था में गंगाजल भरने से बचना चाहिए। जल को भरते समय मन में श्रद्धा और शांति का भाव होना चाहिए।

आधुनिक जीवन में गंगाजल का स्थान
आज का जीवन भले ही तेज गति से चल रहा हो, लेकिन गंगाजल की अहमियत कम नहीं हुई है। विवाह, गृह प्रवेश, पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में गंगाजल की उपस्थिति यह दर्शाती है कि आस्था आज भी हमारी दिनचर्या का हिस्सा है।

गंगाजल केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा विश्वास और अनुभव है। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है, प्रकृति के प्रति सम्मान सिखाता है और जीवन में पवित्रता का संदेश देता है। यही कारण है कि गंगा को मां कहा जाता है क्योंकि वह केवल बहती नहीं, बल्कि हमारे जीवन को सींचती भी है।

TAGGED:गंगा जल के नियमगंगा नदीगंगाजलगंगाजल की महिमाधार्मिक मान्यतापूजा सामग्रीसनातन धर्महिंदू परंपरा
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